Transliteration: (Hurrimat 'alaikumul maitatu waddamu wa lahmul khinzeeri wa maaa uhilla lighiril laahi bihee walmun khani qatu wal mawqoozatu wal mutarad diyatu wanna teehatu wa maaa akalas sabu'u illaa maa zakkaitum wa maa zubiha 'alan nusubi wa an tastaqsimoo bil azlaam; zaalikum fisq; alyawma ya'isal lazeena kafaroo min deenikum falaa takhshawhum wakh shawn; alyawma akmaltu lakum deenakum wa atmamtu 'alaikum ni'matee wa radeetu lakumul Islaama deenaa; famanidturra fee makhmasatin ghaira mutajaanifil li ismin fa innallaaha Ghafoorur Raheem)
इससे मुराद वह जानवर है जो बिना ज़बह किए मर जाए, और ऐसा खाना हराम है। हालांकि इसकी खाल जैसी चीज़ें, जैसे जूते वग़ैरह बनाने के लिए, इस्तेमाल की जा सकती हैं।
उस ज़माने में केवल सूअर का मांस खाना आम था, लेकिन यहां पूरा सूअर ही नापाक और हराम क़रार दिया गया है। अल्लाह ने फ़रमाया: बेशक यह नापाक है (सूरा अनआ'म 6:145)। हदीसों में यह बात वाज़ेह है कि सूअर के तमाम हिस्से हराम हैं, न सिर्फ़ मांस।
वह जानवर जो अल्लाह के नाम के बजाय किसी और के नाम पर ज़बह किया गया हो, वह हराम है। अरब के मुशरिक लोग बुतों के नाम पर ज़बह करते थे। लेकिन अगर कोई जानवर सिर्फ़ बुतों के नाम पर रखा गया हो, और उसे मुसलमान सही तरीक़े से ज़बह करे, तो वह हलाल है। जैसे बहीरा और साइबा नाम वाले जानवर।
ऐसे तमाम जानवर हराम हैं जो गला घुटने, मार खाने, गिर कर, या सींग लगने से मर जाएं। चाहे लाठी, गोली या कोई और ज़रिया हो, ऐसे जानवरों का गोश्त हराम है।
अगर कोई जानवर दरिंदे के हमले से बच जाए, और उसे ज़बह कर लिया जाए इससे पहले कि वह मरे, तो वह हलाल है।
अगर कोई जानवर वेदी या मन्नत की जगह ज़बह किया जाए, इबादत के मक़सद से, तो वह हराम है, चाहे अल्लाह का नाम भी लिया गया हो। लेकिन अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम मुसलमान से जानवर ज़बह कराए, और वह बिस्मिल्लाह पढ़कर ज़बह करे, तो वह जानवर हलाल है क्योंकि नियत में बुत-परस्ती नहीं है।
तीरों से क़िस्मत निकालना, शगुन लेना, या फ़ैसले करना हराम है। हालांकि नेक और सच्चे लोगों से सलाह या मशवरा लेना जायज़ है।
यह आयत हजतुल विदा के मौक़े पर अरफ़ात के मैदान में, जुमा के दिन नाज़िल हुई। इसका मतलब है कि अब काफ़िरों को इस्लाम को मिटाने की कोई उम्मीद नहीं रही।
मुकम्मल करने का मतलब यह है कि अब इस्लाम के तमाम अक़ीदे, शरीअत और उसूल पूरे हो गए। अब कोई नया उसूल नहीं आएगा, और न ही इस्लाम को रद्द किया जाएगा।
नेमत पूरी होने का मतलब है कि मक्का की फ़तह, अमन व अमान, और इरतेदाद (मुनाफ़िक़त) का ख़ात्मा हो गया। "मुकम्मल" का मतलब है पूरापन, और "पूरा किया" का मतलब है कामयाबी— दोनों बातें यहां एक साथ मौजूद हैं।
इससे यह साबित हुआ कि:
अगर कोई शिद्दत की भूख में हो, और उसे हराम चीज़ खाने की मजबूरी हो, बशर्ते उसका इरादा गुनाह का न हो, तो वह जायज़ है।
अगर कोई ज़रूरत से थोड़ा ज़्यादा खा ले, तो भी अल्लाह बख़्शने वाला, रहम करने वाला है।
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