Transliteration: (La'im basatta ilaiya yadaka litaqtulanee maaa ana bibaasitiny yadiya ilaika li aqtulaka inneee akhaaful laaha Rabbal 'aalameen)
इस आयत से पता चलता है कि अगर किसी मज़लूम को ज़ालिम से अपना बचाव करना पड़े, या उसे मारना पड़े, तो यह जायज़ है। लेकिन सच्ची परहेज़गारी यह है कि इंसान अपने आपको बचा ले बिना ज़ुल्म किए, या फिर और ऊँचे दर्जे में यह है कि वह खुद शहीद हो जाए लेकिन बदला न ले। हज़रत उस्मान-ए-ग़नी (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपने ज़ालिमों के ख़िलाफ़ कोई जंग नहीं की, बल्कि सब्र से शहादत को क़ुबूल किया। यही आयत उनकी परहेज़गारी और सब्र की मिसाल मानी जाती है।
हक़ीक़त में हाबील, क़ाबील से कहीं ज़्यादा ताक़तवर था। अगर वह चाहता, तो आसानी से क़ाबील को क़त्ल कर सकता था — और शरीअत के हिसाब से यह जायज़ भी होता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, शायद अपनी नरमी और सहनशीलता की वजह से। यह उसके ऊँचे अख़्लाक़ और जुल्म से दूर रहने की मिसाल है, चाहे बदला लेना मुमकिन ही क्यों न हो।
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