कुरान - 5:75 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

75
مَّا ٱلۡمَسِيحُ ٱبۡنُ مَرۡيَمَ إِلَّا رَسُولٞ قَدۡ خَلَتۡ مِن قَبۡلِهِ ٱلرُّسُلُ وَأُمُّهُۥ صِدِّيقَةٞۖ كَانَا يَأۡكُلَانِ ٱلطَّعَامَۗ ٱنظُرۡ كَيۡفَ نُبَيِّنُ لَهُمُ ٱلۡأٓيَٰتِ ثُمَّ ٱنظُرۡ أَنَّىٰ يُؤۡفَكُونَ

Transliteration: (Mal Maseehub nu Maryama illaa Rasoolun qad khalat min qablihir Rusulu wa ummuhoo siddeeqatun kaanaa yaa kulaanit ta'aam; unzur kaifa nubaiyinu lahumul Aayaati summan zur annaa yu'fakoon)

मसीह, मरयम का बेटा, सिर्फ एक रसूल था [222], और उससे पहले कई रसूल गुज़र चुके हैं [223]। उसकी मां एक सच्ची महिला थी। वे दोनों खाना खाते थे। देखो, हमने उनके लिए निशानियाँ साफ़ साफ़ बयान की हैं। फिर देखो, वे कैसे फिर जाते हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 75 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 75 की तफ़्सीर📖 सूरा अल-माइदा – आयत 75 की तफ़्सीर

 

✅ [222] मसीह (हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम) के बारे में स्पष्टीकरण

"सिर्फ एक रसूल था" — यह स्पष्ट इनकार है कि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) न तो अल्लाह हैं और न ही अल्लाह के बेटे हैं, न शाब्दिक रूप में और न ही दिव्य रूप में। बल्कि वे अल्लाह के बन्दे और नबी हैं। इसका यह मतलब नहीं कि उनमें कोई विशेष गुण नहीं थे — उन्हें क़ुरआन में यह उपाधियाँ दी गई हैं:

  • कलिमतुल्लाह (अल्लाह का शब्द)
  • रूहुल्लाह (अल्लाह की आत्मा)
  • अल-मसीह (मसीहा)
    यह इनकार उनके इंसानी होने और नुबूवत को स्पष्ट करता है, जैसा कि क़ुरआन में आया: "कह दो, मैं भी तुम जैसा एक इंसान हूँ..." (सूरा अल-कहफ़ 18:110)

✅ [223] हज़रत ईसा और मरयम की इज़्ज़त और इंसानियत

मरयम को सिद्दीक़ा कहा गया है, यानी वे ईमानदार और इबादतगुज़ार महिला थीं। क़ुरआन ने हज़रत ईसा और मरयम दोनों की इज़्ज़त और इंसानी हक़ीक़त को बयान किया है, बावजूद इसके कि कुछ लोगों ने उन्हें ख़ुदा बना दिया।
"दोनों खाना खाते थे" — यह बात उनकी इंसानी फ़ितरत को दिखाती है। उन्हें भी सामान्य इंसानों की तरह खाना चाहिए होता था, जिससे साबित होता है कि वे अल्लाह के मोहताज और बंदे थे।
यह दलील है कि खाना और ज़रूरतें इंसान को हमेशा अल्लाह की रहमत और क़ुदरत की याद दिलाती हैं।

✅ [222] मसीह केवल अल्लाह के रसूल थे

मसीह इब्ने मरयम सिर्फ एक रसूल थे [222], और उनसे पहले भी कई रसूल गुज़र चुके हैं [223]। उनकी मां एक सच्ची महिला थीं। वे दोनों खाना खाते थे। देखो, हमने कितनी स्पष्ट निशानियाँ उनके लिए बयान की हैं। फिर देखो, कैसे वे मुंह मोड़ लेते हैं।

✅ [222] मसीह (हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम) के बारे में स्पष्टीकरण

"सिर्फ एक रसूल थे" का मतलब यह है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम न तो अल्लाह हैं और न ही अल्लाह के बेटे, न शाब्दिक रूप में और न ही किसी दिव्य अर्थ में। वे अल्लाह के बन्दे और नबी हैं। इसका मतलब यह नहीं कि उनमें कोई विशेषता नहीं थी — क़ुरआन में उन्हें यह उपाधियाँ भी दी गई हैं:

  • कलिमतुल्लाह (अल्लाह का शब्द)
  • रूहुल्लाह (अल्लाह की आत्मा)
  • अल-मसीह (मसीहा)
    यह तफ़्सील उनके इंसानी होने और नुबूवत को स्पष्ट करती है, जैसे कि क़ुरआन कहता है: "कह दो, मैं भी तुम्हारी तरह एक इंसान हूँ..." (सूरा अल-कहफ़ 18:110)

✅ [223] हज़रत ईसा और मरयम की इज़्ज़त और इंसानियत

मरयम (मरियम) को सिद्दीक़ा कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे सच्ची और ईमानदार महिला थीं। क़ुरआन हज़रत ईसा और उनकी माँ मरयम दोनों की इज़्ज़त और पाकीज़गी को बयान करता है, लेकिन साथ ही उन गुलू (अतिरेक) को भी खारिज करता है जो उन्हें ख़ुदा या ख़ुदा का रूप मानते हैं।
"दोनों खाना खाते थे" — यह उनकी इंसानियत का प्रमाण है। जैसे हर इंसान को खाने की ज़रूरत होती है, उन्हें भी होती थी, और इसी से यह सिद्ध होता है कि वे भी अल्लाह पर निर्भर इंसान थे। खाना खाना एक ऐसा कार्य है जो बंदे को हमेशा अल्लाह की रहमत और क़ुदरत की याद दिलाता है।

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