Transliteration: (Qul ata'budoona min doonil laahi maa laa yamliku lakum darranw wa laa naf'aa; wallaahu Huwas Samee'ul 'Aleem)
यह आयत उन लोगों को संबोधित करती है जो अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत करते हैं, और उनसे सवाल करती है कि ऐसी हस्तियों को पूजना कैसे तर्कसंगत हो सकता है, जिनके पास न लाभ पहुँचाने की ताक़त है और न हानि पहुँचाने की।
इंसान स्वयं किसी को फ़ायदा या नुक़सान नहीं पहुँचा सकता जब तक कि अल्लाह की मशीयत न हो।
यह आयत इशारे में हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के चमत्कारों का भी ज़िक्र करती है — जैसे कि मुसीबतें दूर करना, मुर्दों को जीवित करना, बीमारों को अच्छा करना — और यह सब भी उनकी अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि अल्लाह के हुक्म से होता था।
इसलिए, ऐसे व्यक्तियों या मूर्तियों की इबादत करना जो स्वतंत्र रूप से कुछ भी नहीं कर सकते, अकल और दलील के ख़िलाफ़ है।
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