कुरान - 5:81 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

81
وَلَوۡ كَانُواْ يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلنَّبِيِّ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مَا ٱتَّخَذُوهُمۡ أَوۡلِيَآءَ وَلَٰكِنَّ كَثِيرٗا مِّنۡهُمۡ فَٰسِقُونَ

Transliteration: (Wa law kaanoo yu'minoona billaahi wan nabiyyi wa maaa unzila ilaihi mattakhazoohum awliyaaa'a wa laakinna kaseeram minhum faasiqoon (End Juz 6))

और अगर वे अल्लाह पर, नबी (मुहम्मद) पर, और उस पर जो उनकी तरफ़ नाज़िल किया गया, ईमान लाते, तो वे काफ़िरों को दोस्त न बनाते [231], लेकिन उनमें से अधिकतर लोग फ़ासिक़ (नाफ़रमान) हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 81 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 81 की तफ़्सीर

✅ [231] काफ़िरों से दोस्ती — नाफ़रमानी की निशानी

अगर उनका ईमान सच्चा होता, तो वे कभी काफ़िरों से दोस्ती न करते। मगर यह उनकी नाफ़रमानी का सबूत है कि उन्होंने ईमान के बावजूद ग़लत राह चुनी।

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