कुरान - 5:89 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

89
لَا يُؤَاخِذُكُمُ ٱللَّهُ بِٱللَّغۡوِ فِيٓ أَيۡمَٰنِكُمۡ وَلَٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا عَقَّدتُّمُ ٱلۡأَيۡمَٰنَۖ فَكَفَّـٰرَتُهُۥٓ إِطۡعَامُ عَشَرَةِ مَسَٰكِينَ مِنۡ أَوۡسَطِ مَا تُطۡعِمُونَ أَهۡلِيكُمۡ أَوۡ كِسۡوَتُهُمۡ أَوۡ تَحۡرِيرُ رَقَبَةٖۖ فَمَن لَّمۡ يَجِدۡ فَصِيَامُ ثَلَٰثَةِ أَيَّامٖۚ ذَٰلِكَ كَفَّـٰرَةُ أَيۡمَٰنِكُمۡ إِذَا حَلَفۡتُمۡۚ وَٱحۡفَظُوٓاْ أَيۡمَٰنَكُمۡۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمۡ ءَايَٰتِهِۦ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ

Transliteration: (Laa yu'aakhizukumul laahu billaghwi feee aimaanikum wa laakiny yu'aakhizukumul bimaa 'aqqattumul aimaana a kaffaara tuhooo it'aamu 'asharati masaakeena min awsati maa tut'imoona ahleekum aw kiswatuhum aw tahreeru raqabatin famallam yajid fa Siyaamu salaasati aiyaam; zaalika kaffaaratu aimaanikum izaa halaftum; wahfazooo aimaanakum; kazaalika yubaiyinul laahu lakum Aayaatihee la'allakum tashkuroon)

अल्लाह तुम्हारी उन क़समें नहीं पकड़ता जो ग़लती से या अज्ञानता में खाई गई हों [245]. (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 89 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 89 की तफ़्सीर

✅ [245] ग़लती की हुई क़सम पर कोई गुनाह नहीं

हानाफ़ी फ़िक्ह के अनुसार, लघ्व क़सम वह होती है जो अनजाने में, या किसी ग़लतफ़हमी के तहत खाई जाए — जैसे कोई बात सच समझकर उस पर क़सम खा ली जाए। इसमें झूठ की नियत नहीं होती, इसलिए ना गुनाह होता है और ना ही कोई कफ़्फ़ारा। यह अल्लाह की रहमत है कि वह धोखे से रहित ग़लती को माफ़ कर देता है।

✅ [246] जानबूझकर की गई क़सम तोड़ने पर सज़ा है

मगर जो पक्की क़सम खाई गई हो, उस पर पकड़ होगी [246]। यदि वह तोड़ी जाए तो उसका कफ़्फ़ारा यह है:
– दस ग़रीबों को वही खाना खिलाना जो आमतौर पर अपने घर में खाते हो,
– या उन्हें कपड़े पहनाना,
– या एक ग़ुलाम को आज़ाद करना।

✅ [247] जब ये सब मुमकिन न हो, तो रोज़ा रखो

अगर इनमें से कोई चीज़ मयस्सर न हो, तो तीन दिन लगातार रोज़ा रखना है [247]। यह रोज़ा तभी वैध है जब इंसान वाक़ई में बाकी विकल्प नहीं रखता। और यह क़सम तोड़ने के बाद ही रखा जाता है — पहले से नहीं। यह कफ़्फ़ारा क़सम तोड़ने के कारण है, ख़ुद क़सम के लिए नहीं।

✅ [248] क़समों की हिफ़ाज़त करो

अपनी क़समों की हिफ़ाज़त करो [248] — इसका मतलब है कि क़समों को निभाने के लिए होती हैं, ना कि मनचाहे तरीक़े से तोड़ने के लिए। कफ़्फ़ारा देना क़सम को हल्के में लेने की इजाज़त नहीं देता। यह सिर्फ़ उस वक़्त आता है जब क़सम तोड़ दी जाए, क्योंकि हानाफ़ी उसूलों के अनुसार असर (कफ़्फ़ारा) तभी लागू होता है जब सबब (क़सम तोड़ना) वाक़ेअ हो चुका हो।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now