Transliteration: (Laa yu'aakhizukumul laahu billaghwi feee aimaanikum wa laakiny yu'aakhizukumul bimaa 'aqqattumul aimaana a kaffaara tuhooo it'aamu 'asharati masaakeena min awsati maa tut'imoona ahleekum aw kiswatuhum aw tahreeru raqabatin famallam yajid fa Siyaamu salaasati aiyaam; zaalika kaffaaratu aimaanikum izaa halaftum; wahfazooo aimaanakum; kazaalika yubaiyinul laahu lakum Aayaatihee la'allakum tashkuroon)
हानाफ़ी फ़िक्ह के अनुसार, लघ्व क़सम वह होती है जो अनजाने में, या किसी ग़लतफ़हमी के तहत खाई जाए — जैसे कोई बात सच समझकर उस पर क़सम खा ली जाए। इसमें झूठ की नियत नहीं होती, इसलिए ना गुनाह होता है और ना ही कोई कफ़्फ़ारा। यह अल्लाह की रहमत है कि वह धोखे से रहित ग़लती को माफ़ कर देता है।
मगर जो पक्की क़सम खाई गई हो, उस पर पकड़ होगी [246]। यदि वह तोड़ी जाए तो उसका कफ़्फ़ारा यह है:
– दस ग़रीबों को वही खाना खिलाना जो आमतौर पर अपने घर में खाते हो,
– या उन्हें कपड़े पहनाना,
– या एक ग़ुलाम को आज़ाद करना।
अगर इनमें से कोई चीज़ मयस्सर न हो, तो तीन दिन लगातार रोज़ा रखना है [247]। यह रोज़ा तभी वैध है जब इंसान वाक़ई में बाकी विकल्प नहीं रखता। और यह क़सम तोड़ने के बाद ही रखा जाता है — पहले से नहीं। यह कफ़्फ़ारा क़सम तोड़ने के कारण है, ख़ुद क़सम के लिए नहीं।
अपनी क़समों की हिफ़ाज़त करो [248] — इसका मतलब है कि क़समों को निभाने के लिए होती हैं, ना कि मनचाहे तरीक़े से तोड़ने के लिए। कफ़्फ़ारा देना क़सम को हल्के में लेने की इजाज़त नहीं देता। यह सिर्फ़ उस वक़्त आता है जब क़सम तोड़ दी जाए, क्योंकि हानाफ़ी उसूलों के अनुसार असर (कफ़्फ़ारा) तभी लागू होता है जब सबब (क़सम तोड़ना) वाक़ेअ हो चुका हो।
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