कुरान - 5:92 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

92
وَأَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَ وَٱحۡذَرُواْۚ فَإِن تَوَلَّيۡتُمۡ فَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّمَا عَلَىٰ رَسُولِنَا ٱلۡبَلَٰغُ ٱلۡمُبِينُ

Transliteration: (Wa atee'ul laaha wa atee'ur Rasoola wahzaroo; fa in tawal laitum fa'lamooo annamaa 'alaa Rasoolinal balaaghul mubeen)

अल्लाह की आज्ञा मानो और रसूल की भी आज्ञा मानो [254], और सावधान रहो। फिर यदि तुम मुँह मोड़ लो, तो जान लो कि हमारे रसूल के ज़िम्मे सिर्फ़ स्पष्ट रूप से पैग़ाम पहुँचाना ही है [255]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 92 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 92 की तफ़्सीर

 

✅ [254] अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा — अलग लेकिन एक साथ अनिवार्य

अल्लाह की आज्ञा सभी ईश्वरीय आदेशों का पालन है, जबकि रसूल की आज्ञा में उनकी हदीस और लगातार की जाने वाली सुन्नतें शामिल हैं। रसूल का जो हुक्म हो, वह फ़र्ज़ है, और जो वह लगातार करते रहे, वह मुअक्कद सुन्नत मानी जाती है। इस आयत से यह स्पष्ट होता है कि दोनों प्रकार की आज्ञा पालन करना मूमिन के लिए आवश्यक है।

✅ [255] रसूल का कार्य है केवल पैग़ाम पहुँचाना

यह बात स्पष्ट की गई है कि अगर लोग सुन्नत को ठुकरा दें, तो इससे रसूल की शान या कामयाबी में कोई कमी नहीं आती। जैसे कोई व्यक्ति सूरज की रौशनी को न माने, तो सूरज को कुछ नहीं होता — वैसे ही रसूल का कार्य था स्पष्ट रूप से संदेश पहुँचा देना, जो उन्होंने पूरा कर दिया। अब क़बूल करना या न करना, हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है।

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