Transliteration: (Wa atee'ul laaha wa atee'ur Rasoola wahzaroo; fa in tawal laitum fa'lamooo annamaa 'alaa Rasoolinal balaaghul mubeen)
अल्लाह की आज्ञा सभी ईश्वरीय आदेशों का पालन है, जबकि रसूल की आज्ञा में उनकी हदीस और लगातार की जाने वाली सुन्नतें शामिल हैं। रसूल का जो हुक्म हो, वह फ़र्ज़ है, और जो वह लगातार करते रहे, वह मुअक्कद सुन्नत मानी जाती है। इस आयत से यह स्पष्ट होता है कि दोनों प्रकार की आज्ञा पालन करना मूमिन के लिए आवश्यक है।
यह बात स्पष्ट की गई है कि अगर लोग सुन्नत को ठुकरा दें, तो इससे रसूल की शान या कामयाबी में कोई कमी नहीं आती। जैसे कोई व्यक्ति सूरज की रौशनी को न माने, तो सूरज को कुछ नहीं होता — वैसे ही रसूल का कार्य था स्पष्ट रूप से संदेश पहुँचा देना, जो उन्होंने पूरा कर दिया। अब क़बूल करना या न करना, हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है।
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