Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo la yabluwannnakumul laahu bishai'im minas saidi tanaaluhooo aideekum wa rimaahukum liya'lamal laahu mai yakhaafuhoo bilghaib; famani' tadaa ba'da zaalika falahoo 'azaabun aleem)
यह आयत हिजरी छठे साल की उस घटना की ओर इशारा करती है जब मुसलमान हुदैबिया की संधि के वक्त एहराम में थे और शिकार हराम था। अल्लाह ने उन्हें आज़माने के लिए पक्षियों और जानवरों को उनके हाथों और भालों की पहुँच में भेजा। उन्हें शिकार करना आसान था, लेकिन हर सहाबी ने ज़बरदस्त सब्र और तक़वा के साथ शिकार से परहेज़ किया और इस इम्तिहान में कामयाबी पाई।
इस आज़माइश में दो बड़ी नेमतें अता की गईं:
इसी तरह, नबी ﷺ ने भी अपनी उम्मत को क़ब्र के सवालों और जवाबों से पहले ही आगाह कर दिया, जो अल्लाह की ख़ास रहमत है — क्योंकि इम्तिहान आमतौर पर छुपे होते हैं, लेकिन इस उम्मत को पहले से हिदायत देकर सम्मानित किया गया
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