Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa taqtulus saida wa antum hurum; wa man qatalahoo minkum mut'am midan fajazaaa'um mislu maa qatala minanna'ami yahkumu bihee zawaa 'adlim minkum hadyam baalighal Ka'bati aw kaffaaratun ta'aamu masaakeena aw 'adlu zaalika Siyaamal liyazooqa wabaala amrih; 'afal laahu 'ammaa salaf; wa man 'aada fayanta qimul laahu minh; wallaahu 'azeezun zuntiqaam)
इस आयत से यह साबित होता है कि जब कोई एहराम में हो, तो उसके लिए ज़मीनी जानवरों का शिकार हराम है। हां, हानिकारक या शिकारी जानवरों जैसे पागल कुत्ते, भेड़िए, गिद्ध, चूहे, कौवे आदि को मारना माफ़ है। इसी तरह मच्छर या कीड़े जैसे नुकसानदेह कीड़े भी इस मनाही में शामिल नहीं हैं। यह ममनुअियत सिर्फ़ शिकार योग्य जानवरों पर लागू होती है, न कि हानिकारक जीवों पर।
अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर शिकार करता है, तो उस पर बदले की अदायगी वाजिब है। हालांकि आयत में जानबूझकर का ज़िक्र है, लेकिन हदीसों में भूल से किए गए शिकार पर भी क़फ़्फ़ारा ज़रूरी बताया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि एहराम की पवित्रता बहुत अहम है, चाहे ग़लती से हो या जानबूझकर।
इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के अनुसार, यहाँ "वैसा जानवर" कहने से मुराद है — उस शिकार की क़ीमत के बराबर पैसा देना, न कि असल जानवर। जबकि इमाम शाफ़ई (रह.) के अनुसार, मुराद है — उसी तरह का पालतू जानवर देना। यानी, अबू हनीफ़ा के अनुसार नकद अदायगी, और शाफ़ई के अनुसार असल जानवर की क़ुरबानी।
शिकार करने पर तीन तरह से बदला अदा किया जा सकता है:
यह लचक इस लिए दी गई है ताकि हर शख़्स अपनी सामर्थ्य के अनुसार सच्चे दिल से तौबा कर सके।
इस आयत में फिर ताकीद की गई है कि एहराम में शिकार एक संगीन गुनाह है। यहां तक कि अगर कोई शिकारी की मदद करे — जैसे इशारा करना या पकड़ने में मदद देना — तो वह भी गुनहगार है। एहराम वाला शख़्स ऐसे शिकार का गोश्त भी नहीं खा सकता, भले ही उसे किसी गैर-मोहरिम ने मारा हो। और अगर कई जानवरों का शिकार किया गया हो, तो हर एक के लिए अलग क़फ़्फ़ारा देना होगा। और जो बार-बार यही गुनाह करता है, उस पर अल्लाह की सख़्त गिरफ़्त होती है, क्योंकि अल्लाह इंतिक़ाम लेने में बेहद क़ादिर है।
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