Transliteration: (Ja'alal laahul Ka'batal Baital Haraama qiyaamal linnaasi wash Shahral Haraama walhadya walqalaaa'id; zaalika lita'lamooo annal laaha ya'lamu maa fis samaawaati wa maa fil ardi wa annal laaha bikulli shai'in 'Aleem)
इस आयत में बताया गया है कि काबा सिर्फ़ इबादत का स्थान नहीं, बल्कि यह मुसलमानों की एकता, अमन और जीवन व्यवस्था का केंद्र भी है। यह मुसीबतज़दों को पनाह देता है, हिजाज़ के लोगों के लिए रोज़ी का ज़रिया है, और नमाज़, हज व उमरा की बुनियाद है। काबा के ज़रिए दीन और दुनिया दोनों का निज़ाम क़ायम होता है — यह उम्मत के लिए एक अज़ीम इलाही नेअमत है।
हदी (क़ुरबानी के जानवर) और अश्रुरुल-हुर्म (पवित्र महीने) का ज़िक्र इस ओर इशारा करता है कि ये चीज़ें दीन के अहकाम के साथ-साथ सामाजिक ज़रूरतों को भी पूरा करती हैं। क़ुरबानी से न सिर्फ़ ईमान की ताजगी मिलती है, बल्कि यह ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद का ज़रिया भी बनती है। ये इस्लामी पहचान को मज़बूत करते हैं, ईमान वालों को सहारा देते हैं, और पवित्रता और रहमत का माहौल पैदा करते हैं — खासकर हराम महीनों और इबादतों के दौरान।
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