Transliteration: (Tabbat yadaa abee Lahabinw-wa tabb)
1. वही के कारण:
जब यह मुबारक आयत "और ऐ प्यारे! अपने निकट संबंधियों को डराओ" (सूरत 26: आयत 214) नाज़िल हुई, तो हुज़ूर-ए-पाक ﷺ सफा पहाड़ पर गए। आपने अपने तमाम रिश्तेदारों को इकट्ठा किया और उन्हें अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) और अपनी नुबूवत (पैगंबरी) का पैग़ाम दिया। यह सुनकर अबू लहब गुस्से में भर गया और ताने मारते हुए बोला, "तुम्हारा सत्यानाश हो! क्या तुमने हमें इसी बात के लिए बुलाया है?"
उसकी इस गुस्ताखी और बदतमीज़ी के जवाब में अल्लाह तआला ने यह मुबारक सूरह नाज़िल की, जिसमें अबू लहब और उसकी बीवी (उम्मे जमील) के अंजाम का बयान किया गया।
फायदे:
इस सूरह से हमें कुछ अहम बातें सीखने को मिलती हैं:
सच्चाई का जवाब देना:
हुज़ूर ﷺ ने अल्लाह तआला की तौहीद और अपनी शान में की गई गुस्ताखियों का जवाब दिया। यह अल्लाह तआला की सुन्नत (पारंपरिक रवायत) है कि वह अपने दुश्मनों और हुज़ूर ﷺ के दुश्मनों को जवाब देता है। यह सिखाता है कि सच्चाई का जवाब देना एक पाक रवायत है।
हुज़ूर ﷺ की महबूबियत (प्रियता):
मक्का के काफिरों ने हुज़ूर ﷺ से जो बात कही, अल्लाह तआला ने उसी अंदाज़ में उनको जवाब दिया। इससे साबित होता है कि हुज़ूर ﷺ अल्लाह के सबसे महबूब (प्रिय) हैं।
2. गुस्ताखी की सख्त सजा:
क़ुरआन-ए-पाक में तमाम गुनाहगारों के अंजाम का बयान है, लेकिन सबसे सख्त सजा उन लोगों के लिए बताई गई है जिन्होंने हुज़ूर ﷺ की शान में गुस्ताखी की।
हुज़ूर ﷺ की इज्जत बढ़ाने वालों के लिए इनाम:
जो लोग हुज़ूर ﷺ की शान को बढ़ाते हैं, उन्हें अल्लाह तआला की खास रहमत और नेमतें नसीब होती हैं। यह इनाम किसी दूसरी इबादत के लिए बयान नहीं किया गया।
इससे पता चलता है कि हुज़ूर ﷺ की इज्जत करना सबसे बड़ी नेकी है।
अधिक जानकारी के लिए "सुल्तानत-ए-मुस्तफा" किताब का मुताला करें।
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