कुरान - 23:23 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

23
وَلَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوۡمِهِۦ فَقَالَ يَٰقَوۡمِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنۡ إِلَٰهٍ غَيۡرُهُۥٓۚ أَفَلَا تَتَّقُونَ

Transliteration: (Wa laqad arsalnaa Noohan ilaa qawmihee faqaala yaa qawmi'budul laaha maa lakum min ilahin ghairuhoo afalaa tattaqoon)

23. और बेशक हमने नूह को उनकी क़ौम की तरफ़ भेजा [32], तो उन्होंने कहा, 'ऐ मेरी क़ौम! अल्लाह की इबादत करो [33], उसके सिवा तुम्हारा कोई सच्चा माबूद नहीं है; तो क्या तुम (उससे) डरते नहीं?' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 23 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 23 की तफ़सीर

"और बेशक हमने नूह को उनकी क़ौम की तरफ़ भेजा [32], तो उन्होंने कहा, 'ऐ मेरी क़ौम! अल्लाह की इबादत करो [33], उसके सिवा तुम्हारा कोई सच्चा माबूद नहीं है; तो क्या तुम (उससे) डरते नहीं?'"

[32] हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की आलमी नबूवत

उस ज़माने में रूए ज़मीन पर बसने वाले तमाम इंसान हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की उम्मत थे, क्योंकि आबादी बहुत महदूद थी। हज़रत आदम और हज़रत नूह (अलैहिमुस्सलाम) तमाम इंसानियत की तरफ़ मबऊ़स फ़रमाए गए थे।

[33] तौहीद और इबादत की दावत

हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को ख़ालिस तौहीद की दावत दी कि सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करो जिसका कोई शरीक नहीं। इबादत उसी वक़्त क़ुबूल होती है जब दिल में सही ईमान हो; बग़ैर ईमान के कोई अमल बारगाहे इलाही में क़ाबिले क़ुबूल नहीं।

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