Transliteration: (Faqaalal mala'ul lazeena kafaroo min qawmihee maa haazaaa illaa basharum mislukum yureedu ai yatafaddala 'alaikum wa law shaaa'al laahu la anzala malaaa'ikatam maa sami'naa bihaazaa feee aabaaa'inal awwaleen)
"तो उनकी क़ौम के काफ़िर सरदारों ने कहा, 'यह तो बस तुम्हारे ही जैसा एक इंसान है [34], जो तुम पर अपनी बड़ाई (हुकूमत) जताना चाहता है; और अगर अल्लाह चाहता तो ज़रूर फ़रिश्तों को उतारता [35]; हमने तो यह बात अपने अगले बाप-दादा के ज़माने में कभी नहीं सुनी [36];"
मुनकिरीन ने नबी की अज़मत और ख़ास मक़ाम का इनकार करते हुए कहा कि 'यह तो हमारे ही जैसा इंसान है।' नबियों की ज़ाहिरी बशरीयत को देखकर उनकी बातिनी इस्मत, नुबुव्वत और अज़ीम शान को नज़रअंदाज़ कर देना हमेशा से काफ़िरों और गुमराहों का तरीक़ा रहा है।
काफ़िरों की अक़्ल का फ़साद देखिए कि वे बे-जान पत्थरों और मूर्तियों के सामने तो सजदा करते थे, मगर एक कामिल और मुक़द्दस इंसान को अल्लाह का रसूल मानने से इनकार करते थे और कहते थे कि रसूल फ़रिश्ता होना चाहिए था। जबकि इंसानों की हिदायत के लिए इंसानी रसूल ही सबसे मौज़ूं है ताकि वे उसकी सुन्नत पर अमल कर सकें।
हज़रत इदरीस और हज़रत नूह (अलैहिमुस्सलाम) के दरमियान एक लम्बा ज़माना गुज़र चुका था जिसमें लोग तौहीद भूलकर शिर्क में मुब्तला हो चुके थे। उन्होंने अपने बाप-दादा के ग़लत तरीक़ों को दलील बनाकर हक़ का इनकार कर दिया।
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