कुरान - 23:32 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
فَأَرۡسَلۡنَا فِيهِمۡ رَسُولٗا مِّنۡهُمۡ أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنۡ إِلَٰهٍ غَيۡرُهُۥٓۚ أَفَلَا تَتَّقُونَ

Transliteration: (Fa arsalnaa feehim Rasoolam minhum ani'budul laaha maa lakum min ilaahin ghairuhoo afalaa tattaqoon (section 2))

32. फिर हमने उनमें उन्हीं में से एक रसूल भेजा [50] (जिन्होंने दावत दी) कि [51], 'अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई सच्चा माबूद नहीं है; तो क्या तुम डरते नहीं?' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 32 की तफ़सीर

"फिर हमने उनमें उन्हीं में से एक रसूल भेजा [50] (जिन्होंने दावत दी) कि [51], 'अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई सच्चा माबूद नहीं है; तो क्या तुम डरते नहीं?'"

[50] अपनी ही क़ौम में से रसूल की बअ़सत

अल्लाह तआला ने क़ौमे आद में उन्हीं की क़ौम के अज़ीम फ़रज़न्द हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम) को रसूल बनाकर भेजा। अपनी ही क़ौम में से नबी भेजने की हिकमत यह है कि लोग उनके अख़लाक़, सच्चाई और ख़ानदान से पहले से वाक़िफ़ होते हैं जिससे उनकी पैरवी आसान हो जाती है।

[51] तमाम अम्बिया का मुत्तफ़िक़ा अक़ीदा: तौहीद

तमाम अम्बिया-ए-किराम का अस्ल अक़ीदा तौहीद (अल्लाह का एक होना) रहा है। अगरचे शरीअतों के अहकाम व फ़ुरूआत में फ़र्क़ रहा, मगर अक़ाइद में कोई इख़्तिलाफ़ नहीं था।

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