Transliteration: (Wa qaalal mala-u min qawmihil lazeena kafaroo wa kazzaboo bi liqaaa'il Aakhirati wa atrafnaahum fil hayaatid dunyaa maa haazaaa illaa basharum mislukum yaakulu mimmaa taakuloona minhu wa yashrabu mimmaa tashraboon)
"और उनकी क़ौम के काफ़िर सरदारों ने, जिन्होंने आख़िरत की मुलाक़ात को झुठला दिया था [52] और जिन्हें हमने दुनियावी ज़िन्दगी में बड़ी ऐश व आराम दे रखी थी, कहा, 'यह तो बस तुम्हारे ही जैसा एक इंसान है [53], जो कुछ तुम खाते हो वही यह भी खाता है और जो तुम पीते हो वही यह भी पीता है [54];"
दौलत और दुनियावी ऐशो-इशरत इंसान को अक्सर सरकश बना देती है। तारीख़ गवाह है कि नबियों की मुख़ालफ़त में हमेशा मालदार सरदार आगे रहे, जबकि ग़रीबों और कमज़ोरों ने हक़ को पहले क़ुबूल किया।
काफ़िरों ने कहा कि अगर यह नबी हैं तो हमारी तरह खाना क्यों खाते हैं और पानी क्यों पीते हैं? उनकी अंधी आंखों ने सिर्फ़ ज़ाहिरी खाना देखा, मगर यह न देखा कि उनका खाना नूरानियत और बरकत का मम्बा है। जैसे शहद की मक्खी और भिड़ दोनों एक ही फूल का रस चूसती हैं, मगर मक्खी से शहद बनता है और भिड़ से ज़हर—उसी तरह नबी का बशरी वजूद और आम इंसानों का वजूद ज़मीन व आसमान का फ़र्क़ रखता है।
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