कुरान - 23:43 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

43
مَا تَسۡبِقُ مِنۡ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسۡتَـٔۡخِرُونَ

Transliteration: (Maa tasbiqu min ummatin ajalahaa wa maa yastaakhiroon)

43. कोई भी उम्मत न तो अपनी मुक़र्ररा मुद्दत से आगे बढ़ सकती है और न पीछे रह सकती है; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 43 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 43 की तफ़सीर

"कोई भी उम्मत न तो अपनी मुक़र्ररा मुद्दत से आगे बढ़ सकती है और न पीछे रह सकती है;"

अजल और मुक़र्ररा मुद्दत का अटल निज़ाम

अल्लाह तआला ने हर उम्मत और हर क़ौम के लिए ज़िंदगी और मौत की एक मुक़र्ररा मुद्दत (अजल) लिख दी है। जब अल्लाह का मुक़र्रर किया हुआ वक़्त आ पहुंचता है, तो न उसमें एक लम्हे की ताख़ीर हो सकती है और न वह पहले आ सकता है। यह कायनात के हर फ़र्द और हर क़ौम पर अल्लाह की कामिल क़ुदरत और अज़ली तक़दीर की दलील है।

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