कुरान - 23:44 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

44
ثُمَّ أَرۡسَلۡنَا رُسُلَنَا تَتۡرَاۖ كُلَّ مَا جَآءَ أُمَّةٗ رَّسُولُهَا كَذَّبُوهُۖ فَأَتۡبَعۡنَا بَعۡضَهُم بَعۡضٗا وَجَعَلۡنَٰهُمۡ أَحَادِيثَۚ فَبُعۡدٗا لِّقَوۡمٖ لَّا يُؤۡمِنُونَ

Transliteration: (Summa arsalnaa Rusulanaa tatraa kulla maa jaaa'a ummatar Rasooluhaa kazzabooh; fa atba'naa ba'dahum ba'danw wa ja'alnaahum ahaadees; fabu'dal liqawmil laa yu'minoon)

44. फिर हमने अपने रसूल लगातार एक के बाद एक भेजे; जब भी किसी उम्मत के पास उसका रसूल आया, तो उन्होंने उसे झुठलाया; पस हमने (हलाकत में) एक को दूसरे के पीछे लगा दिया [67] और हमने उन्हें सिर्फ़ अफ़साने (कहानियां) बना डाला [68]; पस लानत व दूरी हो उन लोगों के लिए जो ईमान नहीं लाते [69] ! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 44 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 44 की तफ़सीर

"फिर हमने अपने रसूल लगातार एक के बाद एक भेजे; जब भी किसी उम्मत के पास उसका रसूल आया, तो उन्होंने उसे झुठलाया; पस हमने (हलाकत में) एक को दूसरे के पीछे लगा दिया [67] और हमने उन्हें सिर्फ़ अफ़साने (कहानियां) बना डाला [68]; पस लानत व दूरी हो उन लोगों के लिए जो ईमान नहीं लाते [69] !"

[67] मुसलसल हलाकत का सिलसिला

जब भी किसी क़ौम ने अपने नबी की तकज़ीब की, तो अल्लाह ने उन्हें पिछली हलाकशुदा क़ौमों के साथ मिला दिया और नेस्तो-नाबूद कर दिया।

[68] सिर्फ़ दास्तानें और अफ़साने बाक़ी रहे

उन बड़ी-बड़ी ताक़तवर क़ौमों का कोई नामो-निशान न बचा; वे सिर्फ़ तारीख़ के सफ़हात पर इब्रतनाक कहानियां बनकर रह गईं।

[69] रहमते इलाही से दायमी महरूमी

जो लोग ईमान नहीं लाते, वे अल्लाह की रहमत से हमेशा के लिए दूर और महरूम कर दिए जाते हैं।

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