कुरान - 23:47 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

47
فَقَالُوٓاْ أَنُؤۡمِنُ لِبَشَرَيۡنِ مِثۡلِنَا وَقَوۡمُهُمَا لَنَا عَٰبِدُونَ

Transliteration: (Faqaaloo annu'minu libasharaini mislinaa wa qawmuhumaa lanaa 'aabidoon)

47. तो उन्होंने कहा, 'क्या हम अपने ही जैसे दो इंसानों पर ईमान ले आएं [73], जबकि उनकी क़ौम (बनी इसराईल) हमारी ग़ुलाम (ख़िदमतगार) है [74]?' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 47 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 47 की तफ़सीर

"तो उन्होंने कहा, 'क्या हम अपने ही जैसे दो इंसानों पर ईमान ले आएं [73], जबकि उनकी क़ौम (बनी इसराईल) हमारी ग़ुलाम (ख़िदमतगार) है [74]?'"

[73] नबियों को बशर समझकर इनकार करना

फ़िरऔनियों ने तकब्बुर की वजह से कहा कि 'क्या हम अपने जैसे दो इंसानों (मूसा व हारून) की पैरवी करें?' वे खुद फ़िरऔन जैसे इंसान को ख़ुदा मानते थे, मगर अल्लाह के सच्चे पैग़म्बरों की पैरवी को अपनी ज़िल्लत समझते थे!

[74] मोमिनीन की ग़रीबी व कमज़ोरी को दलील बनाना

वे बनी इसराईल की ग़ुलामी और बे-बसी को देखकर यह समझते थे कि हक़ हमारे पास है। दुनियावी ग़रीबी या कमज़ोरी कभी बातिल होने की दलील नहीं होती; अम्बिया और उनके मुक़र्रब बन्दे अक्सर दुनियावी तौर पर आज़माइशों में मुब्तला किए जाते हैं।

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