Transliteration: (Wa lawit taba'al haqqu ahwaaa'ahum lafasadatis samaawaatu wal ardu wa man feehinnn; bal atainaahum bizikrihim fahum 'an zikrihim mu'ridoon)
"और अगर हक़ उनकी ख़्वाहिशात के ताबे हो जाता [104], तो तमाम आसमान और ज़मीन और जो कोई भी उनके अंदर है [105] सब तबाह व बर्बाद हो जाते! बल्कि हम तो उनके पास वह चीज़ लाए जिसमें उनकी शोहरत (इज़्ज़त की नसीहत) थी [106], मगर वे अपनी ही इज़्ज़त (नसीहत) से मुंह मोड़ रहे हैं।"
यह आयत मुबारका वाज़ेह करती है कि हक़ इंसानी ख़्वाहिशात और मर्ज़ी का ताबे नहीं होता। अगर इलाही हक़ और क़ानून लोगों की नफ़्सानी ख़्वाहिशों के मातहत कर दिया जाता, तो पूरी कायनात में फ़साद, बर्बादी और बिगाड़ बरपा हो जाता।
अलबत्ता कुछ बरगुज़ीदा बन्दे, जैसे हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु), उनकी राय अल्लाह की मर्ज़ी और हिकमत के इतने मुवाफ़िक़ होती थी कि उनके ख़यालात की ताईद में क़ुरआनी आयात नाज़िल हुईं—जैसे पर्दे (हिजाब) के अहकाम, शराब की हुरमत, और मक़ाम-ए-इब्राहीम को नमाज़ की जगह बनाना।
यह हमें नफ़्सानी ख़्वाहिश (हवा) और ईमानी बसीरत व राय के दरमियान फ़र्क़ समझाता है—सिर्फ़ ईमानी बसीरत ही इलाही हिकमत के मुवाफ़िक़ होती है।
कुफ़्फ़ार की ख़्वाहिशात शिर्क, ज़ुल्म और सरकशी को बढ़ावा देती हैं। अगर ऐसे ख़राब और फ़ासिद रुजहानात को इलाही क़ानून की बुनियाद बना दिया जाता, तो पूरा निज़ाम-ए-कायनात दरहम-बरहम हो जाता और अज़ाब नाज़िल होना लाज़िमी हो जाता।
अल्लाह तआला ने उनके पास क़ुरआन-ए-पाक भेजा, जो दुनिया और आख़िरत दोनों में उनकी इज़्ज़त, नामवरी और शरफ़ का ज़रिया था। अगर वे इसे क़बूल कर लेते, तो उन्हें रूहानी वक़ार, क़ियादत और दायमी कामियाबी हासिल होती।
लेकिन अफ़सोस कि उन्होंने तकब्बुर और ग़फ़लत की वजह से मुंह मोड़ लिया—और अपनी ही अज़मत व निजात को ठुकरा दिया।
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