Transliteration: (Am tas'aluhum kharjan fakharaaju Rabbika khairunw wa Huwa khairur raaziqeen)
"क्या आप उनसे कोई उजरत (मुआवज़ा) मांगते हैं? आपके रब का दिया हुआ सवाब ही सबसे बेहतर है [107], और वह सबसे बेहतरीन रोज़ी देने वाला है [108]।"
यह आयत मुनकिरीन के उस बहाने का क़तई रद्द करती है कि वे शायद इस वजह से ईमान नहीं ला रहे कि पैग़म्बर ﷺ उनसे किसी मुआवज़े या उजरत का मुतालबा कर रहे हैं। अल्लाह तआला ने साफ़ फ़रमा दिया कि रसूलुल्लाह ﷺ ने हक़ की तबलीग़ के बदले कभी कोई दुनियावी बदला या माल नहीं मांगा।
उनका इन्कार किसी माली बोझ की वजह से नहीं था, बल्कि सरासर सरकशी, अना और तकब्बुर की बिना पर था। रसूल ﷺ का अज्र व सवाब सिर्फ़ अल्लाह के ज़िम्मे है, और वह इलाही सवाब ही सबसे आला और मुअज़्ज़ज़ है।
यह जुमला अल्लाह तआला की बेमिसाल शान और अज़मत को बयान करता है। 'ख़ैरुर-राज़िक़ीन' (सबसे बेहतरीन रोज़ी देने वाला) का लफ़्ज़ मुतलक़ कमाल को साबित करने के लिए इस्तेमाल होता है।
गो कि इंसान को दुनियावी अस्बाब के ज़रिए भी रोज़ी मिलती है, लेकिन हक़ीक़ी और सबसे बावक़ार रिज़्क़ वही है जो अल्लाह की इबादत, फ़रमांबरदारी और उसकी याद के रास्ते से हासिल हो। वही हर मख़्लूक़ का हक़ीक़ी रोज़ी रसां है।
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