Transliteration: (Wa innnal lazeena laa yu'minoona bil Aakhirati 'anis siraati lanaakiboon)
"और बेशक जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं लाते, वे सीधे रास्ते से भटके हुए हैं [109]।"
यह आयत एक बुनियादी हक़ीक़त को साबित करती है: आख़िरत पर ईमान इंसान की अमली ज़िन्दगी को सीधा रखने में बुनियादी किरदार अदा करता है। जो लोग मरने के बाद दोबारा उठाए जाने और हिसाब-किताब का इन्कार करते हैं, वे लाज़मी तौर पर सीधे रास्ते से भटक जाते हैं—क्योंकि उनके पास कोई इख़लाक़ी ज़ाब्ता और ख़ौफ़-ए-ख़ुदा बाक़ी नहीं रहता।
अल्लाह के सामने खड़े होने के ख़ौफ़ के बग़ैर इंसान गुनाहों, ज़ुल्म और तकब्बुर में मुब्तला हो जाता है। इसके बरअक्स, आख़िरत का यक़ीन इंसान को तक़्वा, आजिज़ी और ज़िम्मेदाराना अमल की तरफ़ उभारता है।
लिहाज़ा आख़िरत का इन्कार सिर्फ़ एक अक़ीदे की ख़राबी नहीं, बल्कि पूरे सीधे रास्ते से भटकने की अस्ल वजह है।
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