कुरान - 23:76 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

76
وَلَقَدۡ أَخَذۡنَٰهُم بِٱلۡعَذَابِ فَمَا ٱسۡتَكَانُواْ لِرَبِّهِمۡ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ

Transliteration: (Wa laqad akhaznaahum bil'azaabi famastakaanoo li Rabbihim wa maa yatadarra'oon)

और बेशक हमने उन्हें अज़ाब (मुसीबत) में पकड़ा, फिर भी वे अपने रब के आगे न झुके और न ही उन्होंने आजिज़ी व गिड़गिड़ाहट इख़्तियार की [111]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 76 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-मोमिनून – आयत 76

"और बेशक हमने उन्हें अज़ाब में पकड़ा, फिर भी वे अपने रब के आगे न झुके और न ही उन्होंने आजिज़ी व गिड़गिड़ाहट इख़्तियार की [111];"

[111] बदबख़्ती और सख़्त दिली की अलामत

यह आयत उन लोगों की रूहानी बदबख़्ती को बयान करती है जिन पर इलाही तंबीह और मुसीबतों का भी कोई असर नहीं होता। जब उन पर सख़्ती और अज़ाब आया, तब भी उन्होंने न तो अल्लाह के आगे आजिज़ी की और न ही इख़्लास के साथ उससे दुआ मांगी।

इससे दो अहम सबक़ हासिल होते हैं:

  1. मुसीबत में भी नाफ़रमानी पर क़ाइम रहना शक़ावत (बदबख़्ती) की खुली निशानी है। नेक दिल आज़माइश में नर्म होकर अल्लाह से रहम व मफ़िरत तलब करता है। ऐसा न करना रूहानी मौत की अलामत है।

  2. रसूलुल्लाह ﷺ की तरफ़ सिर्फ़ दुनियावी ग़रज़ के लिए रुजू करना लेकिन इताअत व तस्लीम से दूर रहना ख़ुदग़र्ज़ी है, ईमान नहीं। जैसे अबू सुफ़ियान (क़ब्ल इस्लाम) क़हत के वक़्त हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में आए लेकिन ताबेदारी इख़्तियार न की।

लिहाज़ा आज़माइशों के वक़्त सच्ची आजिज़ी ईमान की अलामत है और तकब्बुर भरा बेनियाज़ी का रवैया हलाकत का सबब है।

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