कुरान - 23:78 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

78
وَهُوَ ٱلَّذِيٓ أَنشَأَ لَكُمُ ٱلسَّمۡعَ وَٱلۡأَبۡصَٰرَ وَٱلۡأَفۡـِٔدَةَۚ قَلِيلٗا مَّا تَشۡكُرُونَ

Transliteration: (Wa Huwal lazeee ansha a-lakumus sam'a wal absaara wal af'idah; qaleelam maa tashkuroon)

और वही है जिसने तुम्हारे लिए कान, आंखें और दिल बनाए [113]; तुम बहुत ही कम शुक्र अदा करते हो [114]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 78 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-मोमिनून – आयत 78

"और वही है जिसने तुम्हारे लिए कान, आंखें और दिल बनाए [113]; तुम बहुत ही कम शुक्र अदा करते हो [114]!"

[113] हक़ पहचानने के लिए अता की गई कुव्वतें

अल्लाह तआला ने अपनी अज़ीम नेअमतों—कान, आंखें और दिल (अक़्ल व बसीरत)—का ज़िक्र फ़रमाया, जो हक़ को पहचानने और समझने के लिए अता की गई हैं:

  • कान ताकि हक़ की आवाज़ सुनें,

  • आंखें ताकि कुदरत की निशानियों को देखें, और

  • दिल ताकि ग़ौर व फ़िक्र करके हक़ीक़त को समझे।

जब इंसान इन अज़ीम ताक़तों को हक़ की पहचान में इस्तेमाल नहीं करता, तो यह सख़्त नाशुुक्री और रूहानी अंधापन है।

[114] बेशुमार नेअमतों के मुक़ाबले नाशुुक्री

मोमिन अगर उम्र भर भी शुक्र अदा करे, तो वह अल्लाह की एक नेअमत (जैसे एक घूंट पानी) का भी हक़ अदा नहीं कर सकता। और मुनकिरीन का हाल तो यह है कि वे सिरे से शुक्रगुज़ारी ही नहीं करते, क्योंकि सच्ची शुक्रगुज़ारी मुन्इम (नेअमत देने वाले ख़ालिक़) की पहचान और इबादत के बग़ैर मुमकिन नहीं।

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