Transliteration: (Hattaaa izaa fatahnaa 'alaihim baaban zaa 'azaabin shadeedin izaa hum feehi mublisoon (section 4))
"यहाँ तक कि जब हम उन पर सख्त अज़ाब का दरवाज़ा खोल देंगे [112], तो अचानक वे उसमें बिल्कुल मायूस होकर रह जाएंगे।"
यह आयत उस वक़्त का नक़्शा खींचती है जब इलाही अज़ाब अचानक और नाक़ाबिल-ए-बचत होकर नाज़िल होगा। 'सख़्त अज़ाब का दरवाज़ा खोलना' इशारा करता है उस अज़ाब की तरफ़ जो:
मौत के वक़्त रूह क़ब्ज़ होते समय,
क़ब्र के अज़ाब में, या
दुनियावी ज़िल्लत व शिकस्त (जैसे मुसलमानों की फ़तह के ज़रिए काफ़िरों की रुसवाई) में सामने आता है।
चूंकि यह आयत मक्की है, यह किसी एक ख़ास जंग तक महदूद नहीं बल्कि उन तमाम मुकम्मल अज़ाबों को शामिल है जो हठधर्म मुनकिरीन का मुक़द्दर हैं।
उस वक़्त उनकी हालत यह होगी कि वे पूरी तरह मायूस हो जाएंगे और नजात की हर उम्मीद ख़त्म हो जाएगी।
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