Transliteration: (Wa maaa ursiloo 'alaihim haafizeen )
इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अपनी आख़िरत की फ़िक्र को अपनी ज़िम्मेदारी बनाए और दूसरों की फ़िक्र में इस क़दर न डूब जाए कि अपनी ही निजात (मुक्ति) से ग़ाफ़िल हो जाए।
🔹 हर शख़्स को अपने आमाल (कर्मों) का हिसाब देना है, इसलिए उसे चाहिए कि वह सबसे पहले अपने हालात पर ध्यान दे।
🔹 दूसरों की ग़लतियों पर ध्यान देने से पहले इंसान को अपनी ग़लतियों को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।
🔹 दूसरों की हिदायत की फ़िक्र करना अच्छा है, लेकिन अगर इंसान ख़ुद ही ग़फलत में पड़ जाए, तो यह उसकी अपनी आख़िरत के लिए ख़तरनाक हो सकता है।
🔹 इस्लाम तवाज़ुन (संतुलन) सिखाता है – न तो दूसरों की बेतहाशा चिंता में पड़कर अपनी आख़िरत भुलानी चाहिए, और न ही दूसरों की भलाई के बारे में बिल्कुल लापरवाह होना चाहिए।
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