Transliteration: (Fajaaa'at hu ihdaahumaa tamshee 'alas tihyaaa'in qaalat inna abee yad'ooka li yajziyaka ajra maa saqaita lanaa; falammaa jaaa'ahoo wa qassa 'alaihil qasasa qaala laa takhaf najawta minal qawmiz zaalimeen)
"फिर उन दोनों औरतों में से एक उनके पास शर्म व हया से चलती हुई आई [64]; उसने कहा, 'मेरे वालिद आपको बुला रहे हैं ताकि आपको इसका बदला दें जो आपने हमारे लिए पानी पिलाया था।' फिर जब मूसा उनके पास पहुंचे और अपना सारा क़िस्सा बयान किया [66], तो उन्होंने फ़रमाया, 'डरो मत; तुमने ज़ालिम लोगों से नजात पा ली है [67]।'"
हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की बेटी (हज़रत सफ़ूरा) इंतिहाई शर्म व हया के साथ आईं। उन्होंने अपना चेहरा आंचल से ढांप रखा था। उन्होंने हज़रत मूसा को अपने वालिद की तरफ़ से दावत दी। हज़रत मूसा ने कोई उजरत लेने की नीयत न रखी थी मगर बुज़ुर्ग नबी की दावत का एहतराम करते हुए साथ चल पड़े और पाकीज़गी के तहत उस ख़ातून से फ़रमाया कि तुम मेरे पीछे चलो और रास्ते का इशारा देती रहो।
हज़रत मूसा ने हज़रत शुऐब की ख़िदमत में हाज़िर होकर मिस्र के तमाम वाक़िआत, फ़िरऔन के ज़ुल्म और अपनी हिजरत का पूरा हाल सच-सच बयान फ़रमाया।
हज़रत शुऐब ने फ़रमाया कि अब किसी बात का ख़ौफ़ न करो, मदयन फ़िरऔन की सल्तनत से बाहर है, तुम ज़ालिमों के चंगुल से आज़ाद हो चुके हो।
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