Transliteration: (Wa lammaa warada maaa'a Madyana wajada 'alaihi ummatam minannaasi yasqoona wa wajada min doonihimum ra ataini tazoodaani qaala maa khatbukumaa qaalataa laa nasqee hatta yusdirar ri'aaa'u wa aboonaa shaikhun kabeer)
"और जब वे मदयन के कुएं पर पहुंचे [57], तो उन्होंने वहाँ लोगों की एक जमाअत पाई जो (अपने मवेशियों को) पानी पिला रही थी, और उनके परे दो औरतों को पाया [58] जो (अपनी बकरियों को) रोके खड़ी थीं; मूसा ने पूछा, 'तुम्हारा क्या मामला है?' उन्होंने कहा, 'हम पानी नहीं पिला सकतीं जब तक चरवाहे अपने जानवरों को वापस न ले जाएं, और हमारे वालिद बहुत बूढ़े हैं [59]।'"
आठ दिन के मुसलसल पैदल सफ़र के बाद, जिसमें खाने के लिए दरख़्तों के पत्तों के सिवा कुछ न था, हज़रत मूसा मदयन के मशहूर कुएं पर पहुंचे।
वे दोनों हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की बेटियाँ थीं (हज़रत सफ़ूरा और हज़रत शर्फ़ा)। वे शर्म व हया की वजह से मर्दों की भीड़ में नहीं जाती थीं और किनारे खड़ी थीं।
उन्होंने बताया कि हमारे वालिद बूढ़े और ज़ईफ़ हैं, इसलिए हमें बकरियाँ चराने आना पड़ता है, और हम मर्दों की भीड़ छंटने और चरवाहों के जाने के बाद बचे-खुचे पानी से अपने रेवड़ को पानी पिलाती हैं।
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