कुरान - 28:28 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
قَالَ ذَٰلِكَ بَيۡنِي وَبَيۡنَكَۖ أَيَّمَا ٱلۡأَجَلَيۡنِ قَضَيۡتُ فَلَا عُدۡوَٰنَ عَلَيَّۖ وَٱللَّهُ عَلَىٰ مَا نَقُولُ وَكِيلٞ

Transliteration: (Qaala zaalika bainee wa bainaka aiyamal ajalaini qadaitu falaa 'udwaana 'alaiya wallaahu 'alaa ma naqoolu Wakeel (section 3))

मूसा ने कहा, 'यह बात मेरे और आपके दरमियान तय हो गई; इन दोनों मुद्दतों में से जो भी मैं पूरी कर दूँ तो मुझ पर कोई ज़्यादती न होगी [75]; और हम जो कुछ कह रहे हैं उस पर अल्लाह निगहबान (गवाह) है [76]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 28

"मूसा ने कहा, 'यह बात मेरे और आपके दरमियान तय हो गई; इन दोनों मुद्दतों में से जो भी मैं पूरी कर दूँ तो मुझ पर कोई ज़्यादती न होगी [75]; और हम जो कुछ कह रहे हैं उस पर अल्लाह निगहबान (गवाह) है [76]।'"

[75] मुआहदे की क़बूलियत

हज़रत मूसा ने इस मुआहदे को मंज़ूर फ़रमाया कि आठ या दस साल में से जो भी मुद्दत पूरी करूँ, उसके बाद कोई मुतालबा बाक़ी न रहेगा। रिवायत में आता है कि हज़रत मूसा ने कामिल मुद्दत यानी पूरे दस साल ख़िदमत अंजाम दी।

[76] अल्लाह को गवाह बनाना

उन्होंने इस अहद व पैमान पर अल्लाह तआला को गवाह और निगहबान ठहराया। इससे साबित हुआ कि लेन-देन और निकाह के मुआहदात को साफ़-साफ़ तय करना सुन्नत है।

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