Transliteration: (Falammmaa qadaa Moosal ajala wa saara bi ahliheee aanasa min jaanibit Toori naaran qaala li ahlihim kusooo inneee aanastu naaral la 'alleee aateekum minhaa bikhabarin aw jazwatim minan naari la 'allakum tastaloon)
"फिर जब मूसा ने मुद्दत पूरी कर ली और अपने अहलो-अयाल को लेकर चले [77], तो उन्होंने तूर (पहाड़) की जानिब एक आग देखी [78]; उन्होंने अपने घर वालों से कहा, 'तुम ठहरो, मैंने एक आग देखी है; शायद मैं वहाँ से तुम्हारे पास कोई ख़बर लाऊं [79] या आग का कोई अंगारा [80] ताकि तुम ताप सको [81]।'"
इससे मालूम हुआ कि बीवी भी अहले बैत में दाख़िल होती है, क्योंकि उस वक़्त हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के साथ सिर्फ़ उनकी मुक़द्दसा बीवी ही थीं। पस हुज़ूर अकरम ﷺ की पाकीज़ा अज़वाज-ए-मुतहहरात भी यक़ीनन अहले बैत हैं।
सफ़र की रात शदीद सर्द और तारीक थी। हज़रत मूसा रास्ता भूल गए थे और उनकी बीवी को दर्द-ए-ज़ेह (प्रसव पीड़ा) शुरू हो गई थी। उस परेशानी के आलम में अचानक कोहे तूर (वादी-ए-तुवा) की जानिब एक आग चमकती नज़र आई।
चूँकि उनकी बीवी चलने की ताक़त न रखती थीं, इसलिए उन्हें वहीं ठहराया। इसके अलावा हिकमत-ए-इलाही यह थी कि अपने कलीमुल्लाह हज़रत मूसा को ख़ास तन्हाई में बुलाकर उनसे शरफ़-ए-मुकालमा (कलाम) फ़रमाए।
उन्होंने सोचा कि आग के पास कोई मुसाफ़िर या बस्ती होगी जो रास्ते का पता बता सकेगी।
इससे मालूम हुआ कि जंगल में जलती हुई आग से बे-इजाज़त अंगारा या मशअल लेना जायज़ है, क्योंकि आग एक मामूली चीज़ है जिसके देने से कोई इंकार नहीं करता।
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