Transliteration: (Falammaaa ataahaa noodiya min shaati'il waadil aimani fil buq'atil muubaarakati minash shajarati ai yaa Moosaaa inneee Anal laahu Rabbul 'aalameen)
"फिर जब वे उसके पास पहुंचे [82], तो वादी के दायें किनारे से उस बा-बरकत ख़ित्ते में एक दरख़्त से आवाज़ दी गई [83] कि, 'ऐ मूसा! बेशक मैं ही अल्लाह हूँ, तमाम जहानों का रब [84]!'"
हज़रत मूसा जब वहाँ पहुंचे तो देखा कि वह आग नहीं बल्कि एक सुर्ख़ रंग के सब्ज़ दरख़्त से ज़ाहिर होने वाला इलाही नूर था। दरख़्त बिल्कुल सही सलामत था, न जल रहा था और न उसमें से कोई धुआं निकल रहा था।
यह दरख़्त बेरी, बबूल या ज़ैतून का दरख़्त था जो वादी-ए-अयमन के मुबारक ख़ित्ते में वाक़े था (तफ़सीर रूहुल बयान)।
यह दरख़्त ख़ुद कलाम नहीं कर रहा था, बल्कि अल्लाह तआला कलाम फ़रमा रहा था और दरख़्त उस कलाम का महल्ल और इज़हारगाह था। इसी तरह औलिया-ए-किराम की ज़बान से जब अनल-हक़ जैसे कलिमात निकलते हैं तो हक़ीक़त में मुतकल्लिम अल्लाह होता है। मौलाना रूम मसनवी में फ़रमाते हैं: "अगर दरख़्त से 'इन्नी अनल्लाह' कहना जायज़ है, तो किसी कामिल वली के दिल से यह सदा बुलंद हो तो क्यों ना-जायज़ होगी?"
अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से बिना किसी फ़रिश्ते के वास्ते के बराहे रास्त कलाम फ़रमाया, इसी वजह से आपका लक़ब 'कलीमुल्लाह' है। हमारे आक़ा हुज़ूर अकरम ﷺ को शबे मेराज ला-मकां में दीदार और कलाम का सबसे अफ़ज़ल शरफ़ हासिल हुआ।
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