कुरान - 28:32 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
ٱسۡلُكۡ يَدَكَ فِي جَيۡبِكَ تَخۡرُجۡ بَيۡضَآءَ مِنۡ غَيۡرِ سُوٓءٖ وَٱضۡمُمۡ إِلَيۡكَ جَنَاحَكَ مِنَ ٱلرَّهۡبِۖ فَذَٰنِكَ بُرۡهَٰنَانِ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰ فِرۡعَوۡنَ وَمَلَإِيْهِۦٓۚ إِنَّهُمۡ كَانُواْ قَوۡمٗا فَٰسِقِينَ

Transliteration: (Usluk yadaka fee jaibika takhruj baidaaa'a min ghairi sooo'inw wadmum ilaika janaahaka minar rahbi fazaanika burhaanaani mir Rabbika ilaa Fir'awna wa mala'ih; innahum kaanoo qawman faasiqeen)

अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो, वह किसी ऐब (बीमारी) के बग़ैर चमकता हुआ निकलेगा [89], और ख़ौफ़ (दूर करने) के लिए अपने बाज़ू को अपनी तरफ़ समेट लो [90]; तो ये दोनों तुम्हारे रब की तरफ़ से दो खुली सनदें (मौजिज़ात) हैं [91] फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़; बेशक वे नाफ़रमान लोग हैं [92]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 32

"अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो, वह किसी ऐब (बीमारी) के बग़ैर चमकता हुआ निकलेगा [89], और ख़ौफ़ (दूर करने) के लिए अपने बाज़ू को अपनी तरफ़ समेट लो [90]; तो ये दोनों तुम्हारे रब की तरफ़ से दो खुली सनदें (मौजिज़ात) हैं [91] फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़; बेशक वे नाफ़रमान लोग हैं [92]।'"

[89] यदे बैज़ा (चमकता हुआ हाथ)

हज़रत मूसा का हाथ मुबारक किसी बीमारी (जैसे कोढ़ या बरसो-सफ़ेदी) के बग़ैर सूरज की तरह जगमगाता हुआ निकलता था। जब वे उसे गिरेबान से निकालते तो उसकी रौशनी से आँखें चौंधिया जाती थीं। यह सिर्फ़ दायाँ हाथ था।

[90] ख़ौफ़ दूर करने के लिए बाज़ू समेटना

फ़रमाया गया कि जब भी ख़ौफ़ महसूस हो तो अपने बाज़ू को सीने से लगा लो। यह अमल दिल की घबराहट और ख़ौफ़ को दूर करने के लिए आज भी मुजर्रब इलाज है।

[91] दो बुनियादी मोजिज़ात

असा और यदे बैज़ा—ये दोनों इब्तिदाई मोजिज़ात थे जो फ़िरऔन के पास जाने के लिए अता किए गए। बाद में सात और मोजिज़ात (जैसे तूफ़ान, टिड्डियाँ, जुएं, मेंढक, ख़ून वग़ैरा) अता फ़रमाए गए जिससे कुल नौ मोजिज़ात मुकम्मल हुए।

[92] फ़िरऔन और उसके दरबारियों की फ़ासिक़ाना सरकशी

फ़िरऔन और उसके दरबारी इंतिहाई नाफ़रमान, ज़ालिम और झूठे थे, इसलिए उन्हें सीधी राह पर लाने के लिए इन अज़ीम मोजिज़ात की ज़रूरत थी।

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