कुरान - 28:36 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

36
فَلَمَّا جَآءَهُم مُّوسَىٰ بِـَٔايَٰتِنَا بَيِّنَٰتٖ قَالُواْ مَا هَٰذَآ إِلَّا سِحۡرٞ مُّفۡتَرٗى وَمَا سَمِعۡنَا بِهَٰذَا فِيٓ ءَابَآئِنَا ٱلۡأَوَّلِينَ

Transliteration: (Falammaa jaaa'ahum Moosaa bi Aayaatinaa baiyinaatin qaaloo maa haazaaa illaa sihrum muftaranw wa maa sami'naa bihaazaa feee aabaaa'inal awwaleen)

फिर जब मूसा उनके पास हमारी खुली निशानियाँ लेकर आए, तो उन्होंने कहा, 'यह तो बस गढ़ा हुआ जादू है [101], और हमने अपने अगले बाप-दादा के ज़माने में ऐसी बात कभी नहीं सुनी [102]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 36 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 36

"फिर जब मूसा उनके पास हमारी खुली निशानियाँ लेकर आए, तो उन्होंने कहा, 'यह तो बस गढ़ा हुआ जादू है [101], और हमने अपने अगले बाप-दादा के ज़माने में ऐसी बात कभी नहीं सुनी [102]!'"

[101] मोजिज़ात को जादू क़रार देना

फ़िरऔन और उसके सरदारों ने जब असा को अज़दहा बनते और हाथ को सूरज की तरह चमकते देखा, तो अपनी हठधर्मी की वजह से कहने लगे कि यह तो महज़ गढ़ा हुआ जादू और नज़रबंदी है।

[102] तौहीद की दावत से इनकार का झूठा बहाना

वे कहने लगे कि एक ख़ुदा की इबादत और बुतपरस्ती छोड़ने की ऐसी बात तो हमने अपने बाप-दादा के ज़माने से कभी नहीं सुनी। हर दौर के काफ़िरों का यही पुराना दस्तूर रहा है कि वे हक़ के मुक़ाबले में अपने आबा-ओ-अजदाद की रस्मों का सहारा लेते हैं।

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