कुरान - 28:53 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

53
وَإِذَا يُتۡلَىٰ عَلَيۡهِمۡ قَالُوٓاْ ءَامَنَّا بِهِۦٓ إِنَّهُ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّنَآ إِنَّا كُنَّا مِن قَبۡلِهِۦ مُسۡلِمِينَ

Transliteration: (Wa izaa yutlaa 'alaihim qaaloo aamannaa biheee innahul haqqu mir rabbinaaa innaa kunnaa min qablihee muslimeen)

और जब यह उनके सामने पढ़ा जाता है, तो कहते हैं, 'हम इस पर ईमान लाए, बेशक यह हमारे रब की तरफ़ से सच्चा हक़ है; हम तो इससे पहले भी फ़रमांबरदार (मुस्लिम) थे [137]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 53 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 53

"और जब यह उनके सामने पढ़ा जाता है, तो कहते हैं, 'हम इस पर ईमान लाए, बेशक यह हमारे रब की तरफ़ से सच्चा हक़ है; हम तो इससे पहले भी फ़रमांबरदार (मुस्लिम) थे [137]।'"

[137] नुज़ूल-ए-क़ुरआन से पहले भी इस्लाम पर होना

उन्होंने फ़रमाया कि हम पिछली किताबों में आपकी सिफ़ात पढ़कर पहले ही से आप पर और क़ुरआन पर ईमान रखते थे और हम हमेशा से अल्लाह के फ़रमांबरदार (मुस्लिम) रहे हैं। तमाम अंबिया का दीन इस्लाम ही रहा है।

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