कुरान - 28:55 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

55
وَإِذَا سَمِعُواْ ٱللَّغۡوَ أَعۡرَضُواْ عَنۡهُ وَقَالُواْ لَنَآ أَعۡمَٰلُنَا وَلَكُمۡ أَعۡمَٰلُكُمۡ سَلَٰمٌ عَلَيۡكُمۡ لَا نَبۡتَغِي ٱلۡجَٰهِلِينَ

Transliteration: (Wa izaa sami'ul laghwa a'radoo 'anhu wa qaaloo lanaaa a'maalunaa wa lakum a'maalukum salaamun 'alaikum laa nabtaghil jaahileen)

और जब वे कोई बे-हूदा (फ़ुज़ूल) बात सुनते हैं, तो उससे मुंह फेर लेते हैं [141] और कहते हैं, 'हमारे लिए हमारे आमाल हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे आमाल [142]; तुम पर सलामती हो, हम जाहिलों (के तरीक़े) को नहीं चाहते [143]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 55 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 55

"और जब वे कोई बे-हूदा (फ़ुज़ूल) बात सुनते हैं, तो उससे मुंह फेर लेते हैं [141] और कहते हैं, 'हमारे लिए हमारे आमाल हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे आमाल [142]; तुम पर सलामती हो, हम जाहिलों (के तरीक़े) को नहीं चाहते [143]।'"

[141] लग़्व (फ़ुज़ूल) बातों से एराज़

मोमिन की यह शान है कि वह गाली-गलौज, बेहूदा बातों और फ़ुज़ूल झगड़ों में अपना वक़्त बर्बाद नहीं करता बल्कि इज़्ज़त के साथ किनाराकशी इख़्तियार करता है।

[142] आमाल की ज़िम्मेदारी का अहसास

वे साफ़ फ़रमाते हैं कि हर शख़्स अपने अमल का ख़ुद ज़िम्मेदार है, हमें हमारे अच्छे आमाल की जज़ा मिलेगी और तुम्हें तुम्हारी सरकशी की सज़ा।

[143] जाहिलों से किनाराकशी का सलाम

यहाँ 'सलाम' से मुराद तहिय्यत (मुलाक़ात का सलाम) नहीं, बल्कि रुख़्सती और अमन का सलाम है कि हम तुम्हारी जिहालत का जवाब जिहालत से नहीं देना चाहते।

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