Transliteration: (Innaka laa tahdee man ahbabta wa laakinn Allaha yahdee mai yashaaa'; wa huwa a'lamu bil muhtadeen)
"(ऐ महबूब!) बेशक आप जिसे चाहें उसे हिदायत नहीं दे सकते [144], [145] बल्कि अल्लाह ही जिसे चाहता है हिदायत अता फ़रमाता है; और वह हिदायत पाने वालों को ख़ूब जानता है [146]।"
यह आयत हुज़ूर अकरम ﷺ के चचा अबू तालिब की वफ़ात के वक़्त नाज़िल हुई। हुज़ूर ﷺ ने बेपनाह शफ़क़त व मुहब्बत से चाहा कि वे कलिमा पढ़कर ईमान की दौलत पा लें, मगर अल्लाह की तक़दीर में जो लिखा था वही ज़ाहिर हुआ।
हिदायत के दो मफ़हूम हैं: एक 'इराए तरीक़' यानी रास्ता दिखाना, यह तो हुज़ूर ﷺ का बुनियादी मन्सब है जैसा कि फ़रमाया: "बेशक आप सीधे रास्ते की रहनुमाई फ़रमाते हैं।" दूसरा मफ़हूम 'तौफ़ीक़-ए-क़ल्ब' यानी दिल में ईमान पैदा करना है, यह सिर्फ़ अल्लाह की मशिय्यत व क़ुदरत में है।
अल्लाह तआला अपने अज़ली इल्म से ख़ूब जानता है कि कौन सा दिल हक़ को क़बूल करने की सलाहियत रखता है और कौन बदनसीबी के गढ़े में गिरने वाला है।
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