कुरान - 28:77 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

77
وَٱبۡتَغِ فِيمَآ ءَاتَىٰكَ ٱللَّهُ ٱلدَّارَ ٱلۡأٓخِرَةَۖ وَلَا تَنسَ نَصِيبَكَ مِنَ ٱلدُّنۡيَاۖ وَأَحۡسِن كَمَآ أَحۡسَنَ ٱللَّهُ إِلَيۡكَۖ وَلَا تَبۡغِ ٱلۡفَسَادَ فِي ٱلۡأَرۡضِۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلۡمُفۡسِدِينَ

Transliteration: (Wabtaghi feemaaa aataakal laahud Daaral Aakhirata wa laa tansa naseebaka minad dunyaa wa ahsin kamaaa ahsanal laahu ilaika wa laa tabghil fasaada fil ardi innal laaha laa yuhibbul mufsideen)

और जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें दिया है उसके ज़रिये आख़िरत का घर तलाश करो [188], और दुनिया में से अपना हिस्सा न भूलो [189], और भलाई करो जैसा कि अल्लाह ने तुम्हारे साथ भलाई की है [190], और ज़मीन में फ़साद की तलाश न करो [191]; बेशक अल्लाह फ़साद फैलाने वालों को पसंद नहीं फ़रमाता।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 77 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 77

"और जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें दिया है उसके ज़रिये आख़िरत का घर तलाश करो [188], और दुनिया में से अपना हिस्सा न भूलो [189], और भलाई करो जैसा कि अल्लाह ने तुम्हारे साथ भलाई की है [190], और ज़मीन में फ़साद की तलाश न करो [191]; बेशक अल्लाह फ़साद फैलाने वालों को पसंद नहीं फ़रमाता।'"

[188] आख़िरत का घर संवारना

यानी अल्लाह तआला का शुक्र अदा करके और ग़रीबों, मिस्कीनों पर सदक़ा व ख़ैरात करके अपनी दौलत को आख़िरत के लिए ज़ख़ीरा बनाओ ताकि यह माल आख़िरत में तुम्हारे काम आ सके।

[189] दुनिया में अपना हिस्सा न भूलना

यानी इबादत और नेकी का हिस्सा; क्योंकि बंदा जो नेकी और इबादत अल्लाह की राह में करता है वही उसका हक़ीक़ी हिस्सा है, बाक़ी सब तो वारिसों के लिए छोड़ जाना है। बुढ़ापे से पहले जवानी, मौत से पहले ज़िंदगी, बीमारी से पहले सेहत और मसरूफ़ियत से पहले फ़ुरसत को ग़नीमत जानना चाहिए।

[190] अल्लाह के बंदों के साथ हुस्ने सुलूक

जिस तरह अल्लाह ने तुम पर रिज़्क़ और नेमतों का एहसान फ़रमाया है, उसी तरह तुम भी अल्लाह के बंदों पर एहसान और भलाई करो, क्योंकि यह अल्लाह का शुक्र अदा करने का बेहतरीन ज़रीआ है।

[191] ज़मीन में फ़साद न फैलाना

यानी अपनी दौलत और ज़िंदगी को गुनाहों और ज़ुल्म में ख़र्च न करो, क्योंकि गुनाह ही ज़मीन में फ़साद बरपा होने का असल सबब है। जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "ख़ुश्की और तरी में फ़साद ज़ाहिर हो गया लोगों के अपने हाथों के करतूतों की वजह से।"

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