कुरान - 56:2 सूरह अल-वाक़िया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

2
لَيۡسَ لِوَقۡعَتِهَا كَاذِبَةٌ

Transliteration: (Laisa liwaq'atihaa kaazibah)

तो उसके वाक़ेअ होने में किसी के झुठलाने की कोई गुंजाइश न होगी [3]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-वाक़िया आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-वाक़िआ तफ़सीर - आयत 2

"तो उसके वाक़ेअ होने में किसी के झुठलाने की कोई गुंजाइश न होगी [3]!"


[3] क़यामत की हक़ीक़त का यक़ीन—वक़्त गुज़रने के बाद मानना बे-सूद

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि जब क़यामत अपनी तमाम हौलनाकियों के साथ ज़ाहिर हो जाएगी, तो हर काफ़िर और मुनकिर भी अपनी आँखों से देखकर उस पर यक़ीन करने पर मजबूर हो जाएगा। मगर उस वक़्त का मानना और तस्लीम करना किसी काम न आएगा, क्योंकि ईमान तो ग़ैब पर लाने का नाम था।

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