Transliteration: (Yunazzilul malaaa 'ikata birroohi min amrihee 'alaa mai yashaaa'u min 'ibaadiheee an anzirooo annahoo laaa ilaaha illaaa ana fattaqoon)
"वह फ़रिश्तों को अपने हुक्म की रूह [3] के साथ अपने बन्दों में से जिस पर चाहे उतारता है [4] कि, 'डर सुनाओ कि मेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तो मुझी से डरो।'"
वही को रूह इसलिए कहा गया है क्योंकि वह इन्सान को हक़ीक़ी रूहानी ज़िन्दगी अता करती है। जैसे रूह जिस्म को ज़िन्दगी देती है, वैसे ही वही इन्सानी ज़िन्दगी को ईमान व मारिफ़त की हयात बख़्शती है। अगर वही जुदा हो जाए तो रूहानी मौत वाक़े हो जाती है। वही लाने वाले हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम हैं, मगर ताज़ीम के तौर पर जमा का सेग़ा 'फ़रिश्ते' इस्तेमाल हुआ, और बाज़ आयतों के नुज़ूल के वक़्त हज़रत जिब्रील के साथ दूसरे फ़रिश्ते भी हमराह होते थे।
यह यहूद व नसारा के उस एतिराज़ का जवाब है जो नुबुव्वत को सिर्फ़ बनी इस्राईल में मख़्सूस समझते थे; और कुरैश के उस तन्ज़ का जवाब है जो कहते थे कि नुबुव्वत किसी बड़े मालदार को मिलनी चाहिए थी। अल्लाह जिसे चाहे अपने बन्दों में से चुन लेता है। क़ादियानी इस आयत से अपना बातिल दावा साबित नहीं कर सकते, क्योंकि अल्लाह तआला ने हुज़ूर अकरम ﷺ पर ख़त्म-ए-नुबुव्वत की मुहर लगाकर नुबुव्वत का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद फ़रमा दिया है।
डर सुनाने का हुक्म हुज़ूर अकरम ﷺ, मोमिनीन और उलमा-ए-इस्लाम सब के लिए है। दावत व तब्लीग़ का यह काम क़यामत तक जारी रहेगा और हर मुसलमान पर अपनी इस्तेअदाद के मुताबिक़ हक़ की दावत देना लाज़िम है।
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