कुरान - 4:103 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

103
فَإِذَا قَضَيۡتُمُ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ قِيَٰمٗا وَقُعُودٗا وَعَلَىٰ جُنُوبِكُمۡۚ فَإِذَا ٱطۡمَأۡنَنتُمۡ فَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَۚ إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ كَانَتۡ عَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ كِتَٰبٗا مَّوۡقُوتٗا

Transliteration: (Fa izaa qadaitumus Salaata fazkurul laaha qiyaamanw wa qu'oodanw wa 'alaa junoobikum; fa izatma'nantum fa aqeemus Salaah; innas Salaata kaanat 'alal mu'mineena kitaabam mawqootaa)

फिर जब तुम नमाज़ पूरी कर चुको, तो खड़े, बैठे और अपने पहलुओं पर (लेटे) अल्लाह को याद करो; फिर जब तुम मुतमइन हो जाओ तो (मामूल के मुताबिक़) नमाज़ क़ायम करो; बेशक नमाज़ मोमिनों पर मुक़र्ररा वक़्तों में फ़र्ज़ है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 103 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अन-निसा - आयत 103

✅ नमाज़ अपने मुक़र्ररा वक़्तों पर फ़र्ज़

हर हाल में ज़िक्रे इलाही की ताकीद की गई और यह उसूल बयान किया गया कि नमाज़ मुक़र्ररा औक़ात में फ़र्ज़ है जिसे वक़्त पर अदा करना लाज़िम है।

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