Transliteration: (Wa la udillannahum wa la umanni yannnahum wa la aamurannahum fala yubat tikunna aazaanal an'aami wa la aamurannahum fala yughai yirunna khalqal laah; wa mai yattakhizish Shaitaana waliyyam min doonil laahi faqad khasira khusraanam mubeena)
जब लम्बी उम्र, दौलत, या ऐसी दूसरी ख्वाहिशें अल्लाह की याद से रोकने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि ये शैतान की तरफ़ से हैं। लेकिन अगर यही ख्वाहिशें अल्लाह की रज़ा के लिए इस्तेमाल हों — जैसे दौलत को ख़ैरात में देना, या सेहत को इबादत में लगाना — तो ये इबादत बन जाती हैं।
इससे ये मालूम होता है कि गाय की पूजा, दीवाली-होली में जानवरों को सजाना, या मुशरिक़ों की रस्मों की नक़ल करना, ये सब शैतान के कामों में से हैं। मुसलमानों पर लाज़िमी है कि वे ऐसी हरकतों से बचें। उनकी ईदों को सम्मान देना, गंगा नदी को आदर देना, या उनके निशानों को अपनाना, ये सब कुफ़्र में शामिल है।
इस आयत से ये बात साफ़ होती है कि शैतान को कुछ हद तक आने वाले हालात का इल्म है, और उसने जो दावा किया, वह आज के दौर में पूरा होता नज़र आ रहा है। अगर बीमारी (गुमराही) को ताक़त हासिल है, तो इलाज (हिदायत) उससे ज़्यादा ताक़तवर है। शैतान बीमारी है, और नबी व औलिया इलाज हैं।
अल्लाह की ख़ल्क़त में बदलाव की मिसाल है: मर्दों का दाढ़ी मुँडवाना, जो हराम है। जैसे औरत के लिए सिर मुंडाना मना है, वैसे ही मर्द के लिए दाढ़ी हटाना मना है, क्योंकि यह अल्लाह की बनाई शक्ल में दख़ल देना है।
यह आयत उन तमाम आयतों की तफ़्सीर है जो कहती हैं कि अल्लाह के अलावा किसी को दोस्त न बनाओ। यह साफ़ कर दिया गया है कि जो अल्लाह के सिवा को दोस्त बनाता है, असल में वह शैतान को दोस्त बना रहा है।
हमें फ़र्क़ समझना चाहिए — अल्लाह के दोस्त, और शैतान के दोस्त। यह फ़र्क़ बहुत अहम है, क्योंकि शैतान से दोस्ती इस दुनिया और आख़िरत — दोनों में नुक़सान का सबब बनती है।
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