Transliteration: (Laisa bi amaaniyyikum wa laaa amaaniyyi Ahlil Kitaab; mai ya'mal sooo'ai yujza bihee wa laa yajid lahoo min doonil laahi waliyanw wa laa naseeraa)
इस आयत का नुज़ूल उन झूठी उम्मीदों को खत्म करने के लिए हुआ, जो मुख़्तलिफ़ गिरोह रखते थे।
यहूद कहते थे कि हमें बस चालीस दिन की सज़ा मिलेगी, क्योंकि हमने बछड़े की पूजा सिर्फ़ इतने ही दिनों की थी।
नसरानी यह समझते थे कि उन्हें सज़ा नहीं मिलेगी, क्योंकि ईसा (अलैहि०) ने उनके गुनाहों का कफ़्फ़ारा बनकर जान दे दी।
मुशरिक़ यह गुमान रखते थे कि उनके बुत उन्हें जहन्नम से बचा लेंगे।
यह आयत इन सब बेबुनियाद ख़्वाहिशों को पूरी तरह ग़लत ठहराती है।
ऐ यहूद, नसरानी और मुशरिक़ों! तुम्हारा यह ख़्याल कि गुनाह तुम्हें नुक़सान नहीं देंगे, बिलकुल ग़लत है।
जो कोई भी गुनाह करेगा, उसे उसका पूरा बदला मिलेगा, चाहे वह किसी भी मज़हब या गिरोह से ताल्लुक़ रखता हो।
इससे यह भी साबित होता है कि ग़ैर-मुस्लिमों पर भी आख़िरत में शरीअत लागू होगी — यानी उन्हें कुफ़्र के साथ-साथ उनके गुनाहों पर भी सज़ा मिलेगी।
इससे यह हक़ीक़त सामने आती है कि आख़िरत में मददगारों और शफ़ाअत करने वालों से महरूम होना, काफ़िरों के लिए सज़ा का हिस्सा है।
इसके मुकाबले में मोमिनों को अल्लाह की रहमत और फज़ल से, कई मददगार और शफ़ाअत करने वाले नसीब होंगे, जो उनकी मदद करेंगे।
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