Transliteration: (Lay yastankifal Maseehu ai yakoona 'abdal lillaahi wa lal malaaa'ikatul muqarraboon; wa mai yastankif 'an ibaadatihee wa yastakbir fasa yahshuruhum ilaihi jamee'aa)
यह आयत तब नाज़िल हुई जब नजरान के ईसाइयों ने हुज़ूर ﷺ से कहा कि हज़रत ईसा को 'अल्लाह का बंदा' कहना उनका अपमान है। इस पर यह आयत साफ़ कर देती है कि बंदा कहलाना कोई कमी नहीं, बल्कि इज़्ज़त और शान की बात है।
सभी इंसान अल्लाह के बंदे हैं, लेकिन अंबिया (नबी) अल्लाह के सबसे मक़बूल बंदे होते हैं। उनकी ख़ालिस बंदगी के ज़रिये ही अल्लाह की अजमत और बड़ाई ज़ाहिर होती है। जैसे किसी बादशाह की रियाया में सब उसकी ख़िदमत करते हैं, मगर वज़ीर और आला ओहदेदार का मक़ाम सबसे बुलंद होता है — ऐसे ही अंबिया की बंदगी भी आला दर्जे की होती है।
ख़ुद अल्लाह तआला भी इस बंदगी को फ़ख़्र से बयान करता है, जैसे फ़रमाया: “वह (अल्लाह) ही है जिसने अपने रसूल को भेजा...” (सूरा अस-साफ़ 61:9)
इससे हमें ये समझ में आता है कि इबादत पर घमंड करना या अपनी नेकियों को बड़ा समझना गलत रवैया है। अल्लाह की बंदगी से इंकार और घमंड कुफ्र का रास्ता है।
कोई भी नबी ऐसी गलती नहीं कर सकता। मगर ईसाइयों ने हज़रत ईसा पर इल्ज़ाम लगाया कि उन्होंने खुद को खुदा का बेटा कहा — यानी अल्लाह की बंदगी से इंकार किया।
यह आयत इसी बात का रद्द है: मसीह खुद भी अल्लाह की बंदगी को इज़्ज़त समझते हैं, और सबसे क़रीबी फ़रिश्ते भी उसकी बंदगी से गुरेज़ नहीं करते।
असल इज़्ज़त तवाज़ो और अल्लाह की आज़िमत को मानने में है, न कि घमंड में।
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