Transliteration: (Yaa aiyuhan naasu qad jaaa'akum burhaanum mir Rabbikum wa anzalnaaa ilaikum Nooram Mubeena)
"ऐ लोगो!" — यह पुकार सारी इंसानियत के लिए है, किसी एक क़ौम, ज़माने या नस्ल तक सीमित नहीं।
इससे मालूम होता है कि हुज़ूर ﷺ की नबूवत पूरी दुनिया और हर दौर के लिए है।
जैसे अल्लाह तमाम जहानों का रब है, वैसे ही रसूलुल्लाह ﷺ तमाम मख़लूक़ के लिए रहमत बनकर भेजे गए हैं:
"हमने तुम्हें तमाम आलमों के लिए रहमत बनाकर भेजा है।" (सूरा अल-अंबिया 21:107)
"एक साफ़ दलील" से मुराद हुज़ूर ﷺ की मुबारक ज़ात है —
– अल्लाह के वजूद और संदेश की क़ातिअ दलील,
– इलाही इल्म का मजस्समा,
– हक़ का निशान,
– और ज़िंदा मोजिज़ा।
हुज़ूर ﷺ के हर अंग और अमल में मोजिज़ा था:
– उनके लार-ए-मुबारक से आंखें और ज़ख़्म ठीक हो जाते,
– हाथ लगाकर हड्डियाँ दुरुस्त हो जातीं,
– उनके दस्त-ए-मुबारक से खाना और पानी बढ़ जाता।
यानी खुद रसूलुल्लाह ﷺ ही इलाही हक़ का ज़िंदा और अटल सबूत हैं।
"तुम्हारे पास आ चुकी है" — इस जुमले से साबित होता है कि हिदायत अब हर इंसान तक पहुंच गई है।
हुज़ूर ﷺ सिर्फ़ पैग़ाम लाने वाले नहीं, बल्कि हक़ का आख़िरी और पूरा सबूत हैं।
उन्हें न मानना, अल्लाह के सबसे रौशन सबूत को न मानना है।
"रौशन नूर" से मुराद है क़ुरआन पाक —
एक हिदायत वाला, चमकदार और रौशन नज़ूल।
लेकिन आयत के लफ़्ज़ों से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ का आना क़ुरआन से पहले का मरहला है।
पहले पैग़म्बर ﷺ को मानना ज़रूरी है, फिर क़ुरआन को समझा और माना जा सकता है।
क़ुरआन नूर है — लेकिन यह नूर तब असर करता है, जब पहले पैग़म्बर को समझा और अपनाया जाए।
रसूल दलील हैं, और क़ुरआन उस दलील का नूर है।
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