Transliteration: (Fa ammal lazeena aamanoo billaahi wa'tasamoo bihee fasa yudkhiluhum fee rahmatim minhu wa fadlinw wa yahdeehim ilaihi Siraatam Mustaqeema)
"उसकी रस्सी को थामना" में जो "उसकी" है, वह पिछले आयत में ज़िक्र हुई ज़ाहिर दलील, यानी रसूलुल्लाह ﷺ की तरफ़ इशारा है।
इससे हमें यह सीख मिलती है कि:
"अल्लाह की रस्सी" से मुराद रसूलुल्लाह ﷺ हैं, जो अल्लाह और मख़लूक़ के दरमियान का ज़रिया हैं।
जिस तरह कुएं में गिरा हुआ इंसान रस्सी से ऊपर खींचा जाता है, उसी तरह रसूलुल्लाह ﷺ से मज़बूती से जुड़ने वाला इंसान गुमराही से निकलकर हिदायत तक पहुँचता है।
यही वजह है कि अल्लाह ने फ़रमाया:
"और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थामे रहो।" (सूरा आल-इमरान, 3:103)
इस आयत से साफ़ साबित होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ही उम्मत के लिए अल्लाह तक पहुंचने का ज़रिया और हिदायत का सरचश्मा हैं।
रस्सी की मिसाल यह बताती है कि:
– एक सिरा अल्लाह के पास है,
– और दूसरा सिरा रसूलुल्लाह ﷺ के ज़रिये इंसानों तक पहुँचाया गया है।
इसलिए जो लोग रसूलुल्लाह ﷺ की तालीमात, मोहब्बत और इत्तिबा को थामे रहते हैं, वही सच्ची हिदायत पर होते हैं।
जो लोग अल्लाह पर ईमान लाते हैं और रसूलुल्लाह ﷺ से मज़बूती से जुड़े रहते हैं, उन्हें अल्लाह तआला तीन इनाम अता करेगा:
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