Transliteration: (Wa laisatit tawbatu lillazeena ya'maloonas saiyiaati hattaaa izaa hadara ahadahumul mawtu qaala innee tubtul 'aana wa lallazeena yamootoona wa hum kuffaar; ulaaa'ika a'tadnaa lahum 'azaaban aleemaa)
यह उन लोगों की तरफ़ इशारा करता है जो सारी ज़िंदगी गुनाहों में लगे रहते हैं — चाहे वो आक़ीदे के गुनाह हों या अमली बुराइयाँ। यह आयत खास तौर से उन पर लागू होती है जो सिर्फ मौत सामने आने पर तौबा करते हैं।
मर्तद (ईमान से फिर जाने) की तौबा मौत के वक़्त क़बूल नहीं की जाती।
हालाँकि, अगर गुनाहों को सामान्य अर्थ में लिया जाए, तो ऐसी तौबा हालात की मज़बूरी से नाक़ाबिल मानी जाती है — यानी, वो दिल से नहीं, मजबूरी में की जाती है।
पिछली आयत से साफ़ है कि अल्लाह दिल से की गई तौबा क़बूल करता है, लेकिन रूह निकलने के वक्त या अज़ाब शुरू हो जाने के बाद की तौबा मंज़ूर नहीं होती।
इससे यह सबक़ मिलता है कि:
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