Transliteration: (Wa in arattumustib daala zawjim makaana zawjin wa aataitum ihdaahunna qintaaran falaa ta'khuzoo minhu shai'aa; ata'khuzoonahoo buhtaannanw wa ismam mubeenaa)
यह उस हालात की बात है जब:
मर्द पहली बीवी को तलाक़ देकर दूसरी औरत से निकाह करना चाहता है।
इस्लाम यह स्पष्ट करता है कि ऐसी स्थिति में भी पहली बीवी के अधिकार और इज़्ज़त को बरकरार रखा जाए।
अगर शोहर ने बीवी को बहुत बड़ी दौलत — चाहे वो मेहर हो या तोहफ़े, दे दिए हों,
तब भी वह उन्हें वापस नहीं ले सकता।
इससे दो हुक्म सामने आते हैं:
अगर तलाक़ मर्द की तरफ़ से हो,
तो वह बीवी से मेहर या तोहफ़े वापस नहीं मांग सकता।
इससे हमें यह सीख मिलती है कि:
अगर कोई मर्द सिर्फ नापसंद की वजह से बीवी को तलाक़ देना चाहता है,
तो वह खुला (Mehr लौटाकर जुदाई) पर मजबूर नहीं कर सकता।
इस्लाम माली फायदे के लिए तलाक़ को सख़्ती से मना करता है, और इज़्ज़तदार जुदाई को बढ़ावा देता है।
जाहिलियत में मर्द अपनी बीवियों पर झूठा इल्ज़ाम लगाते थे —
ताकि वो मेहर वापस लेने पर मजबूर हो जाएं और तलाक़ ले लें।
इस आयत में ऐसे अमल को खुला गुनाह कहा गया है।
इससे यह साबित होता है कि बीवी पर झूठा इल्ज़ाम लगाना,
ख़ास तौर पर उसकी पाकदामनी पर,
इस्लाम में सबसे संगीन गुनाहों में से है।
⚠️ विशेष ध्यान दें:
उम्मुल मोमिनीन सैय्यदा आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि०) की पाकदामनी पर ज़रा सा भी शक करना कुफ्र है।
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