Transliteration: (Wa kaifa ta'khuzoonahoo wa qad afdaa ba'dukum ilaa ba'dinw wa akhazna minkum meesaaqan ghaleezaa)
इस आयत से यह हुक्म निकलता है कि:
जब शादी के बाद पति-पत्नी के बीच संबंध क़ायम हो जाए,
तो पूरा मेहर मर्द पर वाजिब हो जाता है।
हाँ, अगर रुस्तमाई से पहले तलाक़ हो और पूरा मेहर दिया जा चुका हो,
तो मर्द आधा मेहर वापस ले सकता है।
यह क़ानून निकाह की पाकीज़गी और संबंध की नज़ाकत पर आधारित है।
निकाह के वक़्त पति-पत्नी के बीच एक मजबूत अहद (वाचा) होता है।
यह आयत इस बात का सबूत है कि निकाह इस्लाम में एक बहुत गंभीर और अहम अनुबंध है।
इसलिए अक्सर यह रिवाज होता है कि निकाह से पहले कलिमा पढ़वाया जाता है,
ताकि यह वाचा अल्लाह के सामने सच्चाई और इख़लास के साथ किया जाए।
कुछ परंपराओं में, ख़ास तौर पर भारत में,
दूल्हा-दुल्हन दोनों से कलिमा पढ़वाया जाता है,
ताकि यह वाचा और मज़बूत हो और अल्लाह के सामने गवाही बन जाए।
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