Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa yahillu lakum an tarisun nisaaa'a karhan wa laa ta'duloohunna litazhaboo biba'di maaa aataitumoohunna illaaa ai ya'teena bifaahishatim mubaiyinah; wa 'aashiroo hunna bilma'roof; fa in karihtumoohunna fa'asaaa an takrahoo shai'anw wa yaj'alal laahu feehi khairan kaseeraa)
इस आयत में जाहिलियत के एक रिवाज को ख़त्म किया गया, जिसमें:
मर्द अपने मरे हुए रिश्तेदार की बीवी को जायदाद की तरह विरासत में ले लेता था,
या तो जबरन उससे निकाह कर लेता था,
या उसे दूसरे से निकाह करने से रोक कर, घर में क़ैद कर लेता था।
इस्लाम ने इस अमल को सख़्ती से मना किया और औरतों को इज़्ज़त और आज़ादी वापस दी।
इससे यह बात साबित होती है कि:
अगर कोई आदमी अपनी बीवी को पसंद नहीं करता,
तो वह उसे मेहर वापस लेने या किसी माली फ़ायदे के लिए न तो रोके,
और न ही तलाक़ में ज़ुल्म करे।
बल्कि: अगर औरत को शोहर नापसंद है, तो वह खुला (जुदाई) ले सकती है।
शोहर को चाहिए कि वह इज़्ज़त से उसे रुख़्सत करे, न कि माली फ़ायदे के लिए रोके।
ये मसले फिक़्ह की किताबों में विस्तार से बयान किए गए हैं।
हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि०) के अनुसार:
इस आयत का इशारा उन मर्दों की तरफ़ है जो अपनी बीवी से नफ़रत तो करते हैं,
मगर तलाक़ नहीं देते, ताकि औरत कुछ माल देकर खुद को छुड़ाए।
दूसरे बयानात में आता है:
जाहिलियत में कुछ मर्द बार-बार तलाक़ देकर बीवी को वापस लेते रहते थे,
न उन्हें आज़ाद छोड़ते, न घर बसने देते।
यह आयत ऐसे हरकतों को सख़्ती से नापसंद करती है।
हाँ, अगर औरत में ख़राबी हो और वह शोहर के साथ बुरा सुलूक करे,
तो खुला जायज़ है।
लेकिन अगर ग़लती मर्द की है, तो वह न मेहर वापस ले सकता है,
न औरत से कोई माल मांग सकता है।
इसका मतलब यह है कि:
सिर्फ इसलिए तलाक़ मत दो कि औरत का मिज़ाज तुम्हें पसंद नहीं,
या वह रूप-रंग में अच्छी न लगे।
हो सकता है कि अल्लाह ने उसमें कोई बड़ी भलाई रख दी हो —
जैसे नेक और लाभदायक औलाद,
या कोई और अनदेखी नेमत, जो वक़्त के साथ ज़ाहिर होगी।
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