कुरान - 4:22 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

22
وَلَا تَنكِحُواْ مَا نَكَحَ ءَابَآؤُكُم مِّنَ ٱلنِّسَآءِ إِلَّا مَا قَدۡ سَلَفَۚ إِنَّهُۥ كَانَ فَٰحِشَةٗ وَمَقۡتٗا وَسَآءَ سَبِيلًا

Transliteration: (Wa laa tankihoo maa nakaha aabaaa'ukum minan nisaaa'i illaa maa qad salaf; innahoo kaana faahishatanw wa maqtanw wa saaa'a sabeelaa)

अपने बापों की जिन औरतों से शादी हुई हो, उनसे तुम (अब) शादी न करो [81], मगर जो कुछ पहले हो चुका है वह अलग बात है [82]। बेशक यह एक बेहयाई की बात है, और नफ़रत की चीज़ है, और बहुत ही बुरा रास्ता है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 22 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 22 की तफ़्सीर

 

✅ [81] सौतेली माँ से निकाह सख़्ती से हराम है

अगर "निकाह" का अर्थ वैवाहिक अनुबंध लिया जाए, तो यह बात स्पष्ट होती है कि अपने पिता की पत्नी से विवाह करना हराम है, चाहे पिता ने उससे संबंध बनाए हों या नहीं। लेकिन अगर "निकाह" का अर्थ शारीरिक संबंध लिया जाए, तो हुक्म और व्यापक हो जाता है: जिस भी औरत से पिता ने शारीरिक संबंध बनाया हो—चाहे वैध बीवी के रूप में या गुलाम या रखैल के रूप में—वह औरत बेटे के लिए सदा के लिए हराम (नाजायज़) हो जाती है, क्योंकि वह माँ की हैसियत में आ जाती है। इस हुक्म से पारिवारिक संबंधों की पवित्रता और नैतिक सीमाएं सुरक्षित रहती हैं।

✅ [82] पिछले ज़माने की ग़लतियाँ माफ़ हैं

"मगर जो कुछ पहले हो चुका है" से मुराद यह है कि जाहिलियत के ज़माने में जो ऐसे निकाह हो चुके थे, उनके लिए कोई सज़ा या गुनाह नहीं है। उस वक़्त शरीअत के हुक्म लागू नहीं थे। उदाहरण के तौर पर: अगर कोई अग्निपूजक इस्लाम क़बूल कर ले और उसने अपनी माँ या बहन से निकाह किया हो, तो इस्लाम लाने के बाद ऐसा निकाह फ़ौरन ख़त्म करना होगा। लेकिन इस निकाह से पैदा हुए बच्चे हलाल (जायज़) माने जाएंगे, क्योंकि इस्लाम से पहले वह व्यक्ति शरीअत के हुक्मों का पाबंद नहीं था।

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