कुरान - 4:24 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

24
۞وَٱلۡمُحۡصَنَٰتُ مِنَ ٱلنِّسَآءِ إِلَّا مَا مَلَكَتۡ أَيۡمَٰنُكُمۡۖ كِتَٰبَ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡۚ وَأُحِلَّ لَكُم مَّا وَرَآءَ ذَٰلِكُمۡ أَن تَبۡتَغُواْ بِأَمۡوَٰلِكُم مُّحۡصِنِينَ غَيۡرَ مُسَٰفِحِينَۚ فَمَا ٱسۡتَمۡتَعۡتُم بِهِۦ مِنۡهُنَّ فَـَٔاتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ فَرِيضَةٗۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيۡكُمۡ فِيمَا تَرَٰضَيۡتُم بِهِۦ مِنۢ بَعۡدِ ٱلۡفَرِيضَةِۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمٗا

Transliteration: (Walmuhsanaatu minan nisaaa'i illaa maa malakat aimaanukum kitaabal laahi 'alaikum; wa uhilla lakum maa waraaa'a zaalikum an tabtaghoo bi'amwaalikum muhsineena ghaira musaa fiheen; famastamta'tum bihee minhunna fa aatoohunna ujoorahunna fareedah; wa laa junaaha 'alaikum feemaa taraadaitum bihee mim ba'dil fareedah; innal laaha kaana 'Aleeman Hakeemaa)

और उन औरतों से (भी निकाह हराम किया गया है) जो किसी और के निकाह में हैं [94], सिवाय उन औरतों के जो कुफ्फ़ार के कब्जे में आ गईं [95]। यह अल्लाह का तुम्हारे लिए हुक्म है [96]। और इनके अलावा बाक़ी सारी औरतें तुम्हारे लिए हलाल हैं [97], बशर्ते कि तुम उन्हें अपने माल के बदले चाहो [98], शादी के बंधन में बांधने के इरादे से, न कि केवल हवस की पूर्ति के लिए [99]। फिर जिन औरतों से तुम निकाह करना चाहो [100], उन्हें उनका तय किया हुआ महर दो [101]। और अगर महर तय होने के बाद आपसी रज़ामंदी से उसमें कोई बदलाव कर लो, तो उसमें कोई गुनाह नहीं है [102]। निःसंदेह अल्लाह सब कुछ जानने वाला, हिकमत वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 24 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 24 की तफ़्सीर

 

✅ [94] शादीशुदा औरतों से निकाह हराम है

इससे यह शिक्षा मिलती है कि: जो औरत शादीशुदा है, वह किसी और मर्द के लिए हराम है, जब तक कि उसके शौहर की मौत या सही तरीक़े से तलाक़ न हो जाए।
यह उन मामलों पर भी लागू होता है: जिनमें निकाह को ग़ैर-शरई तरीक़े से ख़त्म कर दिया गया हो, क्योंकि असली निकाह अब भी बरक़रार है।

✅ [95] काफ़िर औरतें जो युद्ध में कब्जे में आएं

अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम औरत मुसलमानों के कब्जे में आ जाए (जैसे युद्ध के दौरान), और उसका शौहर दुश्मन क्षेत्र में हो, तो:
उसका निकाह ख़त्म समझा जाता है, और वह मुसलमान मर्द के लिए हलाल हो जाती है।
⚠️ यह हुक्म मुस्लिम औरतों पर लागू नहीं होता, चाहे उनके शौहर दुश्मन क्षेत्र में ही क्यों न हों।

✅ [96] यह अल्लाह का तयशुदा हुक्म है

ये तमाम आदेश शरीअत के अटल और अल्लाह के मुकर्रर किए हुए हैं।
कोई इंसान इन्हें बदलने या नकारने का हक़ नहीं रखता।
अगर कोई इन्हें न माने, तो वह इस्लाम से बाहर हो जाता है।

✅ [97] बाक़ी सब औरतें हलाल हैं

निकाह की मनाही सिर्फ़ चार कारणों से होती है:
कुफ़्र, सुसराल के रिश्ते, दूध का रिश्ता, और खून का रिश्ता।
इनके अलावा हर औरत हलाल है, जब तक किसी खास मनाही का सबूत न हो।

✅ [98] निकाह में माल देना ज़रूरी है

दो अहम बातों की पुष्टि होती है:

  • महर में वह चीज़ दी जा सकती है जो माल हो, न कि सिर्फ़ सेवा या क़ुरआन की तिलावत।
  • निकाह की पेशकश मर्द की तरफ़ से होनी चाहिए, क्योंकि आयत में मर्दों को संबोधित किया गया है।

✅ [99] हवस की नियत से नहीं, निकाह मक्सद हो

यह आयत सिर्फ़ शारीरिक संबंध के लिए किए गए अस्थायी निकाहों की मनाही करती है।
ऐसे निकाह न तो औलाद के लिए होते हैं, न परिवार बनाने के लिए।
यह ज़िना का रूप माने जाते हैं।
हालाँकि शुरू में मुआवक़ती निकाह की अनुमति थी, पर बाद में यह हराम कर दिया गया।

✅ [100] जिनसे निकाह करना चाहो, उन्हें महर दो

इसमें यह बात भी आती है कि अगर कोई औरत जायज़ तरीके से कब्जे में हो, तो
उससे निकाह के वक़्त पूरा महर देना ज़रूरी है, ताकि निकाह को सिर्फ़ हवस का सौदा न समझा जाए।

✅ [101] महर अदा करना दीन और क़ानून की ज़िम्मेदारी है

महर को कर्ज़ की तरह अदा करना जरूरी है।
इतना ही तय करें जितना अदा करने की क्षमता हो।
यह शरीअत और नैतिक ज़िम्मेदारी है।

✅ [102] आपसी रज़ामंदी से महर में लचीलापन

अगर महर तय हो गया हो, फिर दोनों की रज़ामंदी से कम या ज़्यादा कर लिया जाए,
या कोई पूरी तरह माफ कर दे—तो इसमें कोई गुनाह नहीं।
बशर्ते दोनों राज़ी हों, यह पूरी तरह जायज़ है।

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