Transliteration: (Walmuhsanaatu minan nisaaa'i illaa maa malakat aimaanukum kitaabal laahi 'alaikum; wa uhilla lakum maa waraaa'a zaalikum an tabtaghoo bi'amwaalikum muhsineena ghaira musaa fiheen; famastamta'tum bihee minhunna fa aatoohunna ujoorahunna fareedah; wa laa junaaha 'alaikum feemaa taraadaitum bihee mim ba'dil fareedah; innal laaha kaana 'Aleeman Hakeemaa)
इससे यह शिक्षा मिलती है कि: जो औरत शादीशुदा है, वह किसी और मर्द के लिए हराम है, जब तक कि उसके शौहर की मौत या सही तरीक़े से तलाक़ न हो जाए।
यह उन मामलों पर भी लागू होता है: जिनमें निकाह को ग़ैर-शरई तरीक़े से ख़त्म कर दिया गया हो, क्योंकि असली निकाह अब भी बरक़रार है।
अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम औरत मुसलमानों के कब्जे में आ जाए (जैसे युद्ध के दौरान), और उसका शौहर दुश्मन क्षेत्र में हो, तो:
उसका निकाह ख़त्म समझा जाता है, और वह मुसलमान मर्द के लिए हलाल हो जाती है।
⚠️ यह हुक्म मुस्लिम औरतों पर लागू नहीं होता, चाहे उनके शौहर दुश्मन क्षेत्र में ही क्यों न हों।
ये तमाम आदेश शरीअत के अटल और अल्लाह के मुकर्रर किए हुए हैं।
कोई इंसान इन्हें बदलने या नकारने का हक़ नहीं रखता।
अगर कोई इन्हें न माने, तो वह इस्लाम से बाहर हो जाता है।
निकाह की मनाही सिर्फ़ चार कारणों से होती है:
कुफ़्र, सुसराल के रिश्ते, दूध का रिश्ता, और खून का रिश्ता।
इनके अलावा हर औरत हलाल है, जब तक किसी खास मनाही का सबूत न हो।
दो अहम बातों की पुष्टि होती है:
यह आयत सिर्फ़ शारीरिक संबंध के लिए किए गए अस्थायी निकाहों की मनाही करती है।
ऐसे निकाह न तो औलाद के लिए होते हैं, न परिवार बनाने के लिए।
यह ज़िना का रूप माने जाते हैं।
हालाँकि शुरू में मुआवक़ती निकाह की अनुमति थी, पर बाद में यह हराम कर दिया गया।
इसमें यह बात भी आती है कि अगर कोई औरत जायज़ तरीके से कब्जे में हो, तो
उससे निकाह के वक़्त पूरा महर देना ज़रूरी है, ताकि निकाह को सिर्फ़ हवस का सौदा न समझा जाए।
महर को कर्ज़ की तरह अदा करना जरूरी है।
इतना ही तय करें जितना अदा करने की क्षमता हो।
यह शरीअत और नैतिक ज़िम्मेदारी है।
अगर महर तय हो गया हो, फिर दोनों की रज़ामंदी से कम या ज़्यादा कर लिया जाए,
या कोई पूरी तरह माफ कर दे—तो इसमें कोई गुनाह नहीं।
बशर्ते दोनों राज़ी हों, यह पूरी तरह जायज़ है।
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